शनिवार, 12 जून 2021

आपका औहदा क्या था या क्या है, यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए🙏🙏

*पराजय*
    जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद जब ज्वाइन किया..तो जानकारी हुई की ये जिला ..स्कूली शिक्षा के लिहाज से बहुत पिछड़ा हुआ हैं...वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कहा आप ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान दें..
    बस तय कर लिया..महीने में आठ दस दिन जरूर ग्रामीण स्कूलों को दूंगा..
        शीघ्र ही..ग्रामीण इलाकों में दौरों का सिलसिला चल निकला..पहाड़ी व जंगली इलाका भी था कुछ..
    एक दिन मातहत कर्मचारियों से मालूम हुआ..
  "बड़ेरी " नामक गांव, जो एक पहाड़ी पर स्थित है..वहां के स्कूल में कोई शिक्षा अधिकारी नहीं जाता था क्योंकि वहां पहुंचने के लिए.. वाहन छोड़कर..लगभग दो तीन किलोमीटर जंगली रास्ते से पैदल ही जाना होता था ..
       तय कर लिया अगले दिन वहां जाया जाए..
वहां कोई ,मिस्टर  पी. के. व्यास हेड मास्टर थे.. जो बरसों से, पता नहीं क्यूं.. वहीं जमे हुए थे..! मैंने निर्देश दिए उन्हें कोई अग्रिम सूचना न दी जाय..सरप्राइज विजिट होगी..!
   अगले दिन हम सुबह निकले.. दोपहर बारह बजे..ड्राइवर ने कहा साहब यहां से आगे..पहाड़ी पर पैदल ही जाना होगा दो तीन किलोमीटर..
      मै और दो अन्य कर्मचारी पैदल ही चल पड़े..
लगभग डेढ़ घंटे सकरे..पथरीले जंगली रास्ते से होकर हम ऊपर गांव तक पहुंचे..सामने स्कूल का पक्का भवन था..और लगभग दो  सौ कच्चे पक्के मकान थे..
    स्कूल साफ सुथरा और व्यवस्थित रंगा पुता हुआ था..बस तीन कमरे और प्रशस्त बरामदा..चारों तरफ सुरम्य हरा भरा वन..
      अंदर क्लास रूम में पहुंचे तो तीन कक्षाओं में लगभग सवा सौ बच्चे तल्लीनता पूर्वक पढ़ रहे थे.. हालांकि शिक्षक कोई भी नहीं था..एक बुजुर्ग सज्जन बरामदे में थे जो वहां नियुक्त चपरासी थे.शायद...
     उन्होंने बताया हेड मास्टर साहब आते ही होंगे..
 हम बरामदे में बैठ गए थे..तभी देखा एक चालीस बयालीस वर्ष के सज्जन..अपने दोनो हाथो में पानी की बाल्टियां लिए ऊपर चले आ रहे थे..पायजामा घुटनों तक चढ़ाया हुआ था..ऊपर खादी का कुर्ता जैसा था..!
      उन्होंने आते ही परिचय दिया.. मैं प्रशांत व्यास यहां हेड मास्टर हूं..। यहां इन दिनों ..बच्चों के लिए पानी, थोड़ा नीचे जाकर कुंए से लाना होता है..हमारे चपरासी दादा..बुजुर्ग हैं अब उनसे नहीं होता..इसलिए मै ही लेे आता हूं..वर्जिश भी हो जाती है..वे मुस्कुराकर बोले..
   उनका चेहरा पहचाना सा लगा और नाम भी..
मैंने उनकी और देखकर पूछा..तुम प्रशांत व्यास हो..इंदौर से.. गुजराती कॉलेज..!
      मैंने हेट उतार दिया था.. उसने कुछ पहचानते हुए .. चहकते हुए कहा..आप अभिनव.. हैं, अभिनव श्रीवास्तव..! मैंने कहा और नहीं तो क्या.. भई..!
       लगभग बीस बाईस बरस पहले हम इंदौर में साथ ही पढ़े थे..बेहद होशियार और पढ़ाकू था  वो..बहुत कोशिश करने के बावजूद शायद ही कभी उससे ज्यादा नंबर आए हों.. मेरे..!
         एक प्रतिस्पर्धा रहती थी हमारे बीच..जिसमें हमेशा वही जीता करता था..
      आज वो हेड मास्टर था और मैं..जिला शिक्षा अधिकारी.. पहली बार उससे आगे निकलने.. जीतने.. का भाव था.. और सच कहूं तो खुशी थी मन में..
       मैंने सहज होते हुए पूछा.. यहां कैसे पहुंचे.. भई..?. और कौन कौन है घर पर..? 
             उसने विस्तार से बताना शुरू किया..
  " एम. कॉम करते समय ही बाबूजी की मालवा मिल वाली नौकरी जाती रही थी..फिर उन्हें दमे की बीमारी भी तो थी..! ..घर चलाना मुश्किल हो गया था..किसी तरह पढ़ाई पूरी की.. नम्बर अच्छे  थे.. इसलिए संविदा शिक्षक की नियुक्ति मिल गई थी..जो छोड़ नहीं सकता था..आगे पढ़ने की न गुंजाइश थी न स्थितियां..इस गांव में पोस्टिंग मिल गई..मां बाबूजी को  लेकर यहां चला आया..सोचा गांव में कम पैसों में गुजारा हो ही जायेगा..!"
       फिर उसने हंसते हुए कहा.. "इस दुर्गम गांव में पोस्टिंग..और वृद्ध.. बीमार मां बाप को देख..कोई लड़की वाले लड़की देने तैयार नहीं हुए..इसलिए विवाह नहीं हुआ..और ठीक भी है.. कोई पढ़ी लिखी लड़की  भला यहां क्या करती..! 
         अपनी कोई पहुंच या पकड़ भी नहीं थी कि यहां से ट्रांसफर करा पाते..तो बस यहीं जम गए..यहां आने के कुछ बरस बाद..मां बाबूजी दोनों ही चल बसे..
  यथा संभव उनकी सेवा करने का प्रयास किया..
अब यहां बच्चों में..स्कूल में मन रम गया है..
  छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर.. आस पास की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण करने चला जाता हूं...
.. ..रोज शाम को स्कूल के बरामदे में बुजुर्गों को पढ़ा देता हूं..अब शायद इस गांव में कोई निरक्षर नहीं है..नशा मुक्ति का अभियान भी चला रक्खा है..अपने हाथों से खाना बना लेता हूं..और किताबें पढ़ता हूं.. बच्चों को अच्छी बुनियादी शिक्षा.. अच्छे संस्कार मिल जाएं..अनुशासन सीखें बस यही ध्येय है.. मै सी ए नहीं कर सका पर मेरे दो विद्यार्थी सी ए हैं..और कुछ अच्छी नौकरी में भी..।
     .. मेरा यहां कोई ज्यादा खर्च है नहीं.. मेरी ज्यादातर तनख़ा इन बच्चों के खेल कूद और स्कूल पर खर्च हो जाती हैं...तुम तो जानते हो कॉलेज के जमाने से क्रिकेट खेलने का जुनून था..! वो बच्चों के साथ खेल कर पूरा हो जाता है..बड़ा सुकून मिलता है.."
      मैंने टोकते हुए कहा...मां बाबूजी के बाद शादी का विचार नहीं आया..?
   उसने मुस्कुराते हुए कहा.." दुनियां में सारी अच्छी चीजें मेरे लिये नहीं बनी है..
   इसलिए जो सामने है..उसी को अच्छा करने या बनाने की कोशिश कर रहा हूं.."
    फिर अपने परिचित दिलचस्प अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला.".अरे वो फ़ैज़ साहेब की एक नज़्म में है न..! .."अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो..अब यहां कोई नहीं..कोई नहीं आएगा.."
      उसकी उस बेलौस हंसी ने भीतर तक भिगो दिया था..
    लौटते हुए मैंने उससे कहा..प्रशांत तुम जब चाहो तुम्हारा ट्रांसफर मुख्यालय या जहां तुम चाहो करा दूंगा..
      उसने मुस्कुराते हुए कहां..अब बहुत देर हो चुकी है.जनाब.. अब यहीं इन लोगों के बीच खुश हूं..कहकर उसने हाथ जोड़ दिए..
      मेरी अपनी उपलब्धियों से उपजा दर्प..उससे आगे निकल जाने का अहसास..भरम.. चूर चूर हो गया था..
    वो अपनी जिंदगी की तमाम कमियों.. तकलीफों..असुविधाओं के बावजूद सहज था. उसकी कर्तव्यनिष्ठा देखकर.. मै हतप्रभ था ..जिंदगी से..किसी शिकवे या.. शिकायत की कोई झलक उसके व्यवहार में...नहीं थी..
    सुखसुविधाओं..उपलब्धियों.. ओहदों के आधार पर हम लोगों का मूल्यांकन करते हैं..लेकिन वो इन सब के बिना मुझे फिर पराजित कर गया था..!
  लौटते समय उस कर्म ऋषि को हाथ जोड़कर..भरे मन से इतना ही कह सका..तुम्हारे इस पुनीत कार्य में कभी मेरी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना मित्र.         
       
             💥जीवन दर्शन💥
 आपका औहदा क्या था या क्या है, यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए🙏🙏

डीएवी सिवान के प्राचार्य श्री  बी आनंद के कलम से

Bandana

शुक्रवार, 11 जून 2021

अंतिम राय तभी बनाये और कोई टिप्पणी तभी करें, जब आपके पास पूरी जानकारी हो।

🙏 मनीष ने 1 घंटे में 10 किमी की दूरी तय की, अनीश ने उतनी ही दूरी डेढ़ घंटे में तय की।

दोनों में से कौन तेज और स्वस्थ हुआ?

बेशक हमारा जवाब होगा मनीष।

क्या होगा यदि हम कहें कि मनीष ने इस दूरी को तैयार ट्रैक पर तय किया जबकि अनीश ने रेतीले रास्ते पर चल कर किया ?

तब हमारा जवाब होगा " अनीश।"
 
लेकिन हमें पता चला कि मनीष 50 साल के हैं जबकि अनीश 25 साल के हैं?

तब हमारा जवाब फिर से "मनीष" होगा।

लेकिन हमें यह भी पता चला कि अनीश का वजन 140 किलो था जबकि मनीष का वजन 65 किलो था।

दोबारा हमारा जवाब होगा  " अनीश" ।

जैसे-जैसे हम अनीश और मनीष के बारे में और जानेंगे, बेहतर कौन है, इस बारे में हमारी राय और निर्णय बदलते जाएंगे।

हम बहुत सतही तरीके से और जल्दबाजी में राय बनाते हैं जिसकी वजह से हम अपने और दूसरों के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं।
 
अंतिम राय तभी बनाये और  कोई टिप्पणी तभी करें, जब आपके पास पूरी जानकारी हो। 

सकारात्मक रहें, निर्माण करें, जिंदगी बहुत खूबसूरत है।   🙏

Bandana

बुधवार, 9 जून 2021

मिलजुल कर इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद करें।

जब टाईटेनिक समुन्द्र में डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफिरों को बचा सकते थे।
सबसे करीब जो जहाज़ मौजूद था उसका नाम SAMSON था और वो हादसे के वक्त टाईटेनिक से सिर्फ सात मील की दूरी पर था।
SAMSON के कैप्टन ने न सिर्फ टाईटेनिक की ओर से फायर किए गए सफेद शोले (जो कि बेहद खतरे की हालत में हवा में फायर किये जाते हैं।) देखे थे, बल्कि टाईटेनिक के मुसाफिरों के चिल्लाने के आवाज़ को भी सुना भी था। लेकिन सैमसन के लोग गैर कानूनी तौर पर बेशकीमती समुन्द्री जीव का शिकार कर रहे थे और नहीं चाहते थे कि पकड़े जाएं, अपने जहाज़ को दूसरी तरफ़ मोड़ कर चले गए।

यह जहाज़ हम में से उन लोगों की तरह है जो अपनी गुनाहों भरी जिन्दगी में इतने मग़न हो जाते हैं कि उनके अंदर से इनसानियत खत्म हो जाती है।

दूसरा जहाज़ जो करीब मौजूद था उसका नाम CALIFORNIAN था, जो हादसे के वक्त टाईटेनिक से चौदह मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने भी टाईटेनिक की ओर से निकल रहे सफेद शोले अपनी आखों से देखे,  क्योंकि टाईटेनिक उस वक्त बर्फ़ की चट्टानों से घिरा हुआ था और उसे उन चट्टानों के चक्कर काट कर जाना पड़ता, इसलिए वो कैप्टन सुबह होने का इन्तजार करने लगा।और जब सुबह वो टाईटेनिक की लोकेशन पर पहुंचा तो टाईटेनिक को समुन्द्र की तह मे पहुचे हुए चार घंटे गुज़र चुके थे और टाईटेनिक के कैप्टन Adword_Smith  समेत 1569 मुसाफिर डूब चुके थे।

यह जहाज़ हम लोगों मे से उनकी तरह है जो किसी की मदद करने के लिए अपनी सहूलियत और आसानी देखते हैं और अगर हालात सही न हों तो अपना फ़र्ज़ भूल जाते हैं।

तीसरा जहाज़ CARPHATHIYA था जो टाईटेनिक से 68 मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने रेडियो पर टाईटेनिक के मुसाफारों की चीख पुकार सुनी, जबकि उसका जहाज़ दूसरी तरफ़ जा रहा था, उसने फौरन अपने जहाज़ का रुख मोड़ा और बर्फ़ की चट्टानों और खतरनाक़ मौसम की परवाह किए बगैर मदद के लिए रवाना हो गया। हालांकि वो दूर होने की वजह से टाईटेनिक के डूबने के दो घंटे बाद लोकेशन पर पहुच सका लेकिन यही वो जहाज़ था, जिसने लाईफ बोट्स की मदद से टाईटेनिक के बाकी 710 मुसाफिरों को जिन्दा बचाया था और उन्हें हिफाज़त के साथ न्यूयार्क पहुचा दिया था।
उस जहाज़ के कैप्टन "आर्थो रोसट्रन " को ब्रिटेन की तारीख के चंद बहादुर कैप्टनों में शुमार किया जाता है और उनको कई सामाजिक और सरकारी आवार्ड से भी नवाजा गया था।

हमारी जिन्दगी में हमेशा मुश्किलें रहती हैं, चैलेंज रहते हैं लेकिन जो इन मुश्किल और चैलेंज का सामना करते हुए भी इन्सानियत की भलाई के लिए कुछ कर जाए वही सच्चा इन्सान है। 

आज के माहौल में जिस किसी ने भी अपनी सामर्थ्य अनुसार किसी की मदद की है, समझो विश्व रूपी टाइटैनिक के डूबने से पहले उसने जिंदगियां बचाने का पुण्य प्राप्त किया है। अभी संकट दूर नहीं हुआ है। अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है। आओ मिलजुल कर इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद करें।
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Bandana

शब्दों का विष

शब्दों का विष 

18 दिन के युद्ध ने द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था।
शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी !
नगर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था।
पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ते था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे।
उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को ताक रही थी। 

तभी श्रीकृष्ण कक्ष में प्रविष्ट होते हैं।
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण उसके सर को सहलाते रहते हैं एवं रोने देते हैं।

थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं। 

द्रौपदी: 
"यह क्या हो गया सखा?? ऐसा तो नहीं सोचा था।"

कृष्ण: 
"नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली,वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती।
हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है।
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थीं और तुम सफल हुई, द्रौपदी।
तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ।सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,सारे कौरव समाप्त हो गए।तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।"

द्रौपदी:
"सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए?"

कृष्ण: "नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से परिचित कराने के लिए आया हूँ। 
हमारे कर्मों के परिणाम को हम दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं तो हमारे हाथ मे कुछ नहीं रहता।"

द्रौपदी:
"तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदाई हूँ कृष्ण?"

कृष्ण: "नहीं द्रौपदी! तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो।
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी भी दूरदर्शिता रखती तो स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पातीं।"
द्रौपदी:
"मैं क्या कर सकती थी कृष्ण?"

कृष्ण: 
"जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती तो शायद परिणाम कुछ और होते।
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी परिणाम कुछ और होते। 
और उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।
वह नहीं करती तो तुम्हारा चीर हरण नहीं होता तब भी शायद परिस्थितियां कुछ और होती।
और, हमें

अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत ज़रूरी होता है…
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है…

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।
ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे,
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

 "शब्दों की शक्ति व आयु असीमित है।"

Bandana

सुसंगत से प्राप्त सद्गति

#सुसंगत से  प्राप्त सद्गति

एक भँवरे की मित्रता एक गोबरी ( गोबर में रहने वाले ) कीड़े से थी, एक दिन कीड़े ने भँवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे प्रिय मित्र हो इसलिए तुम आज मेरे पास भोजन के लिए आओ

भंवरा भोजन खाने पहुँचा !  खाने के बाद भंवरा सोच में पड़ गया- कि मैंने बुरे का संग किया इसलिए आज मुझे गोबर खाना पड़ा । अब भँवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया कि तुम कल मेरे यहाँ खाने पर आओ

अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा ! भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल पर बिठा दिया ! कीड़े ने परागरस पिया ! मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर मंदिर ले गया तथा बिहारी जी के चरणों में चढ़ा दिया ! कीड़े को ठाकुर जी के दर्शन हुए , चरणों में बैठने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ ! 
संध्या काल में पुजारी ने सारे फूल इकट्ठे किए और गंगा जी में छोड़ आए ! कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था ! इतने मे भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा- मित्र ! क्या हाल है ? 
कीड़े ने कहा- भाई ! जन्म जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी ! ये सब अच्छी संगत का फल है 
*संगत से गुण उपजे, संगत से गुण जाए*
*लोहा लगा जहाज़ में, पानी में उतराय*
कोई भी नहीं जानता कि.. हम इस जीवन के सफर में एक दूसरे से क्यों मिलते हैं 
सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु परमात्मा हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता है 
*हमें उन रिश्तों को हमेशा संजो कर रखना चाहिए*

*जय श्री कृष्णा* 🙏🏻

Bandana

मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं

🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता भटक गया..😃

तभी उसने देखा, एक शेर उसकी तरफ आ रहा है..

कुत्ते की सांस रूक गई और मन ही मन सोचने लगा:- आज तो काम तमाम मेरा..! 😎

ये विचार आते ही उसने एक फार्मूला अपनाया.....👍

उसने सामने कुछ सूखी हड्डियां पड़ी देखी.. 😃

वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसते हुए शेर को सुनाने के लिए जोर जोर से बोलने लगा:-

 वाह ! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है,एक और मिल जाए तो आज पूरी दावत हो जायेगी.....! 😃
और जोर से डकार मारी..

 शेर सोच में पड़ गया..😃
उसने सोचा.... 
ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है ! जान बचा कर भागने मे ही भलाई है !😃

और शेर वहां से जान बचा के भाग गया..😃

पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था.. 😂

उसने सोचा ये अच्छा मौका है.... शेर को सारी कहानी बता देता हूं ..😎

शेर से दोस्ती भी हो जायेगी,और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी टल जाएगा......😎 

वो फटाफट शेर के पीछे भागा..😃

कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि ये जरूर कुछ गड़बड़ करेगा......😎

उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी, कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है..😃

ये सुनकर शेर जोर से दहाड़ा -
चल मेरे साथ, अभी उसकी लीला ख़तम करता हूं..... 😎😎

और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर कुत्ते की तरफ चल दिया..😃

क्या आप बता सकते हैं कि कुत्ते ने दूसरा कौन सा फार्मूला अपनाया होगा❓🤔🤔

कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसके आगे जान का संकट आ गया... 😎

मगर फिर हिम्मत कर कुत्ता उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया और मैनेजमेंट का एक और फार्मूला अपनाया..... 😃

और जोर जोर से बोलने लगा:-

इस बन्दर को भेजे एक घंटा हो गया..साला अभी तक एक शेर को फंसा कर नहीं ला सका......!😃

यह सुनते ही शेर ने बंदर को वहीं पटका और वापस भाग गया.... 😃

*शिक्षा 1-* मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं👍

*शिक्षा 2-* हार्ड वर्क के बजाय स्मार्ट वर्क ही करें क्योंकि यहीं जीवन की असली सफलता मिलेगी 👍

*शिक्षा 3-* आपकी ऊर्जा, समय और ध्यान भटकाने वाले कई बन्दर आपके आस पास हैं, उन्हें पहचानिए और उनसे सावधान रहिए 😎

*व्यस्त रहिए, स्वस्थ रहिए*
😃😃😃

Bandana

स्नेह_के_आँसू

*ll #स्नेह_के_आँसू ll* 

गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल  की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। 

"दीदी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" 
सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। 

"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"

उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - 
"भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।"

"कैसी बात कर रही हैं दीदी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" 
सब्जीवाले ने कहा। 

"नहीं भैया!  उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं।  जब सब ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे,  तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी।  मैं किसी और से सब्जी  नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है,  अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" 
महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। 

"ओ बहन जी !  तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे।  अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? सब्जी वाले हैं, कोई नेता तो है नहीं कि वादा करके छोड़ दें।  रुके रहो दो मिनिट।" 

और सब्जी वाले ने एक थैली के अंदर टमाटर , आलू , प्याज , घीया , कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – 

"भैया !  तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो , कम से कम तोल तो लेते ,  और मुझे पैसे भी बता दो।  मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। 

"वाह..... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और बहिन ! मैं  कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ ।  ये सब तो यहीं से कमाया है,  इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी । बच्चों का खूब ख्याल रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।" 
और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। 

अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह *स्नेह के आंसुओं* से भरी हुईं थीं। 

*(नि:शब्द )*

Bandana