बुधवार, 9 जून 2021

राम सुग्रीव मित्रता

💐राम सुग्रीव मित्रता 💐

मित्रता के मायने क्या है ? मित्रता के आदर्श क्या है ? पूरा संसार यह गुह्यविज्ञान तो प्रभुपाद श्रीराम से सीखे ! वीरवर हनुमान अपने गुप्तचर / दौत्य कर्म का समुचित निर्वहन कर सम्यक समाधान पश्चात सौमित्र सहित प्रभु श्रीराम को ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित सुग्रीव की सुरक्षित गुफा में ले आते है ! सामान्य शिष्टाचारी वार्तालाप पश्चात सीधे आगमन प्रयोजन पर संवाद होता है ! सुग्रीव प्रभुपाद से राजनैतिक संधि की आकांक्षा रखते है और तदनुसार ही प्रस्ताव रखते है ! प्रभुपाद उसे अस्वीकार कर मैत्री की बात करते है ! हनुमत काष्ठ पलकों को घिसकर अग्न्याधान कर मैत्री के रिश्ते को अग्निसाक्षी बनाते है ! प्रभुपाद सभी को मैत्री का मूल्य समझाते है ! तो अगर आप नही जानते है तो सुने ----
             "मैत्री में किसी वस्तु या सामान या संसाधन का आदान प्रदान नहीं होता बल्कि संसाधन का सामूहिक अधिकारपूर्वक उपयोग होता हूं! उपकार के उत्तर स्वरूप किसी प्रति उपकार की आशा नही की जाती ! मैत्री किसी वणिक का सौदा नहीं है जो मुद्रा के बदले वस्तु दे ! मैत्री में कोई पक्ष बड़ा या छोटा नहीं होता बल्कि बराबर होता है ! मैत्री में लिंग,रक्त,वंश,आयु और प्रतिष्ठा के मापदंड लागू नहीं होते ! किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह या राष्ट्र की किसी अन्य से मैत्री हो सकती है ! मैत्री में उपकार के बदले उपकार किया भी जा सकता है और नहीं भी ! प्रति उपकार हालात पर निर्भर होता है ! मैत्री का आधार स्वार्थ नहीं बल्कि प्रेम ,सद्भाव और समर्पण होता है ! मैत्री में प्यार/ प्रेम का विनिमय ही स्वीकृत है ! किसी अन्य का नहीं! मैत्री की आँखे सदैव बंद और हृदय सदैव खुला रहता है ! मैत्री मित्र को मन की आखों से ही देखती है ! मित्र का दुख खुद का दुख और मित्र का सुख खुद का सुख ! पृथक पृथक दैहिक शरीरों की एकात्म अनुभूति ही मैत्री है !  " 

प्रभुपाद राम केवल स्वार्थयुक्त राजनैतिक संधि ही चाहते तो परम सामर्थ्यवान महाराज बालि से करते न कि राज्य बहिष्कृत सुग्रीव से ! लेकिन प्रभुपाद राम संसार को मैत्री के असल प्रतिमान का पाठ पढ़ाते है ! श्रीराम प्रेम और मैत्री के भूखे है ! श्रीराम मन,वचन और कर्म से स्वच्छ और पवित्र है और उनका छल ,कपट और छिद्र से मुक्त है ! 

         भारत के सर्वोच्च आराध्य प्रभुपाद के पदचिन्हों पर चलने के लिए किसी उपदेश की आवश्यकता न होनी चाहिए क्योंकि स्वयं प्रभुपाद ने संसार को कोई उपदेश न दिया ! उनके द्वारा  समय समय पर किया कार्य व्यवहार और आचरण ही श्रेष्ठ और अनुकरणीय है और वही धर्म है ! सब चले धर्म के मार्ग पर ! जो सत्य में सत्य और सनातन है !

ताराचंद खेतावत
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Bandana

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