बुधवार, 9 जून 2021

मिलजुल कर इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद करें।

जब टाईटेनिक समुन्द्र में डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफिरों को बचा सकते थे।
सबसे करीब जो जहाज़ मौजूद था उसका नाम SAMSON था और वो हादसे के वक्त टाईटेनिक से सिर्फ सात मील की दूरी पर था।
SAMSON के कैप्टन ने न सिर्फ टाईटेनिक की ओर से फायर किए गए सफेद शोले (जो कि बेहद खतरे की हालत में हवा में फायर किये जाते हैं।) देखे थे, बल्कि टाईटेनिक के मुसाफिरों के चिल्लाने के आवाज़ को भी सुना भी था। लेकिन सैमसन के लोग गैर कानूनी तौर पर बेशकीमती समुन्द्री जीव का शिकार कर रहे थे और नहीं चाहते थे कि पकड़े जाएं, अपने जहाज़ को दूसरी तरफ़ मोड़ कर चले गए।

यह जहाज़ हम में से उन लोगों की तरह है जो अपनी गुनाहों भरी जिन्दगी में इतने मग़न हो जाते हैं कि उनके अंदर से इनसानियत खत्म हो जाती है।

दूसरा जहाज़ जो करीब मौजूद था उसका नाम CALIFORNIAN था, जो हादसे के वक्त टाईटेनिक से चौदह मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने भी टाईटेनिक की ओर से निकल रहे सफेद शोले अपनी आखों से देखे,  क्योंकि टाईटेनिक उस वक्त बर्फ़ की चट्टानों से घिरा हुआ था और उसे उन चट्टानों के चक्कर काट कर जाना पड़ता, इसलिए वो कैप्टन सुबह होने का इन्तजार करने लगा।और जब सुबह वो टाईटेनिक की लोकेशन पर पहुंचा तो टाईटेनिक को समुन्द्र की तह मे पहुचे हुए चार घंटे गुज़र चुके थे और टाईटेनिक के कैप्टन Adword_Smith  समेत 1569 मुसाफिर डूब चुके थे।

यह जहाज़ हम लोगों मे से उनकी तरह है जो किसी की मदद करने के लिए अपनी सहूलियत और आसानी देखते हैं और अगर हालात सही न हों तो अपना फ़र्ज़ भूल जाते हैं।

तीसरा जहाज़ CARPHATHIYA था जो टाईटेनिक से 68 मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने रेडियो पर टाईटेनिक के मुसाफारों की चीख पुकार सुनी, जबकि उसका जहाज़ दूसरी तरफ़ जा रहा था, उसने फौरन अपने जहाज़ का रुख मोड़ा और बर्फ़ की चट्टानों और खतरनाक़ मौसम की परवाह किए बगैर मदद के लिए रवाना हो गया। हालांकि वो दूर होने की वजह से टाईटेनिक के डूबने के दो घंटे बाद लोकेशन पर पहुच सका लेकिन यही वो जहाज़ था, जिसने लाईफ बोट्स की मदद से टाईटेनिक के बाकी 710 मुसाफिरों को जिन्दा बचाया था और उन्हें हिफाज़त के साथ न्यूयार्क पहुचा दिया था।
उस जहाज़ के कैप्टन "आर्थो रोसट्रन " को ब्रिटेन की तारीख के चंद बहादुर कैप्टनों में शुमार किया जाता है और उनको कई सामाजिक और सरकारी आवार्ड से भी नवाजा गया था।

हमारी जिन्दगी में हमेशा मुश्किलें रहती हैं, चैलेंज रहते हैं लेकिन जो इन मुश्किल और चैलेंज का सामना करते हुए भी इन्सानियत की भलाई के लिए कुछ कर जाए वही सच्चा इन्सान है। 

आज के माहौल में जिस किसी ने भी अपनी सामर्थ्य अनुसार किसी की मदद की है, समझो विश्व रूपी टाइटैनिक के डूबने से पहले उसने जिंदगियां बचाने का पुण्य प्राप्त किया है। अभी संकट दूर नहीं हुआ है। अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है। आओ मिलजुल कर इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद करें।
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Bandana

शब्दों का विष

शब्दों का विष 

18 दिन के युद्ध ने द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था।
शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी !
नगर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था।
पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ते था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे।
उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को ताक रही थी। 

तभी श्रीकृष्ण कक्ष में प्रविष्ट होते हैं।
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण उसके सर को सहलाते रहते हैं एवं रोने देते हैं।

थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं। 

द्रौपदी: 
"यह क्या हो गया सखा?? ऐसा तो नहीं सोचा था।"

कृष्ण: 
"नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली,वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती।
हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है।
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थीं और तुम सफल हुई, द्रौपदी।
तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ।सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,सारे कौरव समाप्त हो गए।तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।"

द्रौपदी:
"सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए?"

कृष्ण: "नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से परिचित कराने के लिए आया हूँ। 
हमारे कर्मों के परिणाम को हम दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं तो हमारे हाथ मे कुछ नहीं रहता।"

द्रौपदी:
"तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदाई हूँ कृष्ण?"

कृष्ण: "नहीं द्रौपदी! तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो।
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी भी दूरदर्शिता रखती तो स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पातीं।"
द्रौपदी:
"मैं क्या कर सकती थी कृष्ण?"

कृष्ण: 
"जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती तो शायद परिणाम कुछ और होते।
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी परिणाम कुछ और होते। 
और उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।
वह नहीं करती तो तुम्हारा चीर हरण नहीं होता तब भी शायद परिस्थितियां कुछ और होती।
और, हमें

अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत ज़रूरी होता है…
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है…

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।
ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे,
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

 "शब्दों की शक्ति व आयु असीमित है।"

Bandana

सुसंगत से प्राप्त सद्गति

#सुसंगत से  प्राप्त सद्गति

एक भँवरे की मित्रता एक गोबरी ( गोबर में रहने वाले ) कीड़े से थी, एक दिन कीड़े ने भँवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे प्रिय मित्र हो इसलिए तुम आज मेरे पास भोजन के लिए आओ

भंवरा भोजन खाने पहुँचा !  खाने के बाद भंवरा सोच में पड़ गया- कि मैंने बुरे का संग किया इसलिए आज मुझे गोबर खाना पड़ा । अब भँवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया कि तुम कल मेरे यहाँ खाने पर आओ

अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा ! भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल पर बिठा दिया ! कीड़े ने परागरस पिया ! मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर मंदिर ले गया तथा बिहारी जी के चरणों में चढ़ा दिया ! कीड़े को ठाकुर जी के दर्शन हुए , चरणों में बैठने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ ! 
संध्या काल में पुजारी ने सारे फूल इकट्ठे किए और गंगा जी में छोड़ आए ! कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था ! इतने मे भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा- मित्र ! क्या हाल है ? 
कीड़े ने कहा- भाई ! जन्म जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी ! ये सब अच्छी संगत का फल है 
*संगत से गुण उपजे, संगत से गुण जाए*
*लोहा लगा जहाज़ में, पानी में उतराय*
कोई भी नहीं जानता कि.. हम इस जीवन के सफर में एक दूसरे से क्यों मिलते हैं 
सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु परमात्मा हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता है 
*हमें उन रिश्तों को हमेशा संजो कर रखना चाहिए*

*जय श्री कृष्णा* 🙏🏻

Bandana

मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं

🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता भटक गया..😃

तभी उसने देखा, एक शेर उसकी तरफ आ रहा है..

कुत्ते की सांस रूक गई और मन ही मन सोचने लगा:- आज तो काम तमाम मेरा..! 😎

ये विचार आते ही उसने एक फार्मूला अपनाया.....👍

उसने सामने कुछ सूखी हड्डियां पड़ी देखी.. 😃

वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसते हुए शेर को सुनाने के लिए जोर जोर से बोलने लगा:-

 वाह ! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है,एक और मिल जाए तो आज पूरी दावत हो जायेगी.....! 😃
और जोर से डकार मारी..

 शेर सोच में पड़ गया..😃
उसने सोचा.... 
ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है ! जान बचा कर भागने मे ही भलाई है !😃

और शेर वहां से जान बचा के भाग गया..😃

पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था.. 😂

उसने सोचा ये अच्छा मौका है.... शेर को सारी कहानी बता देता हूं ..😎

शेर से दोस्ती भी हो जायेगी,और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी टल जाएगा......😎 

वो फटाफट शेर के पीछे भागा..😃

कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि ये जरूर कुछ गड़बड़ करेगा......😎

उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी, कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है..😃

ये सुनकर शेर जोर से दहाड़ा -
चल मेरे साथ, अभी उसकी लीला ख़तम करता हूं..... 😎😎

और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर कुत्ते की तरफ चल दिया..😃

क्या आप बता सकते हैं कि कुत्ते ने दूसरा कौन सा फार्मूला अपनाया होगा❓🤔🤔

कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसके आगे जान का संकट आ गया... 😎

मगर फिर हिम्मत कर कुत्ता उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया और मैनेजमेंट का एक और फार्मूला अपनाया..... 😃

और जोर जोर से बोलने लगा:-

इस बन्दर को भेजे एक घंटा हो गया..साला अभी तक एक शेर को फंसा कर नहीं ला सका......!😃

यह सुनते ही शेर ने बंदर को वहीं पटका और वापस भाग गया.... 😃

*शिक्षा 1-* मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं👍

*शिक्षा 2-* हार्ड वर्क के बजाय स्मार्ट वर्क ही करें क्योंकि यहीं जीवन की असली सफलता मिलेगी 👍

*शिक्षा 3-* आपकी ऊर्जा, समय और ध्यान भटकाने वाले कई बन्दर आपके आस पास हैं, उन्हें पहचानिए और उनसे सावधान रहिए 😎

*व्यस्त रहिए, स्वस्थ रहिए*
😃😃😃

Bandana

स्नेह_के_आँसू

*ll #स्नेह_के_आँसू ll* 

गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल  की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। 

"दीदी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" 
सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। 

"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"

उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - 
"भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।"

"कैसी बात कर रही हैं दीदी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" 
सब्जीवाले ने कहा। 

"नहीं भैया!  उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं।  जब सब ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे,  तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी।  मैं किसी और से सब्जी  नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है,  अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" 
महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। 

"ओ बहन जी !  तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे।  अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? सब्जी वाले हैं, कोई नेता तो है नहीं कि वादा करके छोड़ दें।  रुके रहो दो मिनिट।" 

और सब्जी वाले ने एक थैली के अंदर टमाटर , आलू , प्याज , घीया , कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – 

"भैया !  तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो , कम से कम तोल तो लेते ,  और मुझे पैसे भी बता दो।  मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। 

"वाह..... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और बहिन ! मैं  कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ ।  ये सब तो यहीं से कमाया है,  इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी । बच्चों का खूब ख्याल रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।" 
और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। 

अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह *स्नेह के आंसुओं* से भरी हुईं थीं। 

*(नि:शब्द )*

Bandana

राम सुग्रीव मित्रता

💐राम सुग्रीव मित्रता 💐

मित्रता के मायने क्या है ? मित्रता के आदर्श क्या है ? पूरा संसार यह गुह्यविज्ञान तो प्रभुपाद श्रीराम से सीखे ! वीरवर हनुमान अपने गुप्तचर / दौत्य कर्म का समुचित निर्वहन कर सम्यक समाधान पश्चात सौमित्र सहित प्रभु श्रीराम को ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित सुग्रीव की सुरक्षित गुफा में ले आते है ! सामान्य शिष्टाचारी वार्तालाप पश्चात सीधे आगमन प्रयोजन पर संवाद होता है ! सुग्रीव प्रभुपाद से राजनैतिक संधि की आकांक्षा रखते है और तदनुसार ही प्रस्ताव रखते है ! प्रभुपाद उसे अस्वीकार कर मैत्री की बात करते है ! हनुमत काष्ठ पलकों को घिसकर अग्न्याधान कर मैत्री के रिश्ते को अग्निसाक्षी बनाते है ! प्रभुपाद सभी को मैत्री का मूल्य समझाते है ! तो अगर आप नही जानते है तो सुने ----
             "मैत्री में किसी वस्तु या सामान या संसाधन का आदान प्रदान नहीं होता बल्कि संसाधन का सामूहिक अधिकारपूर्वक उपयोग होता हूं! उपकार के उत्तर स्वरूप किसी प्रति उपकार की आशा नही की जाती ! मैत्री किसी वणिक का सौदा नहीं है जो मुद्रा के बदले वस्तु दे ! मैत्री में कोई पक्ष बड़ा या छोटा नहीं होता बल्कि बराबर होता है ! मैत्री में लिंग,रक्त,वंश,आयु और प्रतिष्ठा के मापदंड लागू नहीं होते ! किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह या राष्ट्र की किसी अन्य से मैत्री हो सकती है ! मैत्री में उपकार के बदले उपकार किया भी जा सकता है और नहीं भी ! प्रति उपकार हालात पर निर्भर होता है ! मैत्री का आधार स्वार्थ नहीं बल्कि प्रेम ,सद्भाव और समर्पण होता है ! मैत्री में प्यार/ प्रेम का विनिमय ही स्वीकृत है ! किसी अन्य का नहीं! मैत्री की आँखे सदैव बंद और हृदय सदैव खुला रहता है ! मैत्री मित्र को मन की आखों से ही देखती है ! मित्र का दुख खुद का दुख और मित्र का सुख खुद का सुख ! पृथक पृथक दैहिक शरीरों की एकात्म अनुभूति ही मैत्री है !  " 

प्रभुपाद राम केवल स्वार्थयुक्त राजनैतिक संधि ही चाहते तो परम सामर्थ्यवान महाराज बालि से करते न कि राज्य बहिष्कृत सुग्रीव से ! लेकिन प्रभुपाद राम संसार को मैत्री के असल प्रतिमान का पाठ पढ़ाते है ! श्रीराम प्रेम और मैत्री के भूखे है ! श्रीराम मन,वचन और कर्म से स्वच्छ और पवित्र है और उनका छल ,कपट और छिद्र से मुक्त है ! 

         भारत के सर्वोच्च आराध्य प्रभुपाद के पदचिन्हों पर चलने के लिए किसी उपदेश की आवश्यकता न होनी चाहिए क्योंकि स्वयं प्रभुपाद ने संसार को कोई उपदेश न दिया ! उनके द्वारा  समय समय पर किया कार्य व्यवहार और आचरण ही श्रेष्ठ और अनुकरणीय है और वही धर्म है ! सब चले धर्म के मार्ग पर ! जो सत्य में सत्य और सनातन है !

ताराचंद खेतावत
💐💐💐

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पक्षीराज गरुण और कागभुशुण्डि जी संवाद

*पक्षीराज गरुण और कागभुशुण्डि जी संवाद*

पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान कर कहिए॥

हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है, फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है।सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥

संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान्‌ पुण्य कौन सा है और सबसे महान्‌ भयंकर पाप कौन है॥

फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है।

*काकभुशुण्डिजी ने कहा-* 
हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥

ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥

जगत्‌ में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत्‌ में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥

संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥

किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। 

हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥
वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। 

दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥

और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥

शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥

जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥

जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। 

हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥

यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)॥

ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥

अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥

मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥
एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे?॥

नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥

इस प्रकार जगत्‌ में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुःखी हो रहे हैं। मैंने ये थो़ड़े से मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परंतु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही॥

प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिए जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परंतु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषय रूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥

*यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥*

*जय सियाराम जय जय हनुमान* 

🙏

Bandana