बुधवार, 9 जून 2021

स्नेह_के_आँसू

*ll #स्नेह_के_आँसू ll* 

गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल  की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। 

"दीदी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" 
सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। 

"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"

उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - 
"भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।"

"कैसी बात कर रही हैं दीदी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" 
सब्जीवाले ने कहा। 

"नहीं भैया!  उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं।  जब सब ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे,  तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी।  मैं किसी और से सब्जी  नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है,  अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" 
महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। 

"ओ बहन जी !  तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे।  अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? सब्जी वाले हैं, कोई नेता तो है नहीं कि वादा करके छोड़ दें।  रुके रहो दो मिनिट।" 

और सब्जी वाले ने एक थैली के अंदर टमाटर , आलू , प्याज , घीया , कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – 

"भैया !  तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो , कम से कम तोल तो लेते ,  और मुझे पैसे भी बता दो।  मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। 

"वाह..... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और बहिन ! मैं  कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ ।  ये सब तो यहीं से कमाया है,  इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी । बच्चों का खूब ख्याल रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।" 
और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। 

अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह *स्नेह के आंसुओं* से भरी हुईं थीं। 

*(नि:शब्द )*

Bandana

राम सुग्रीव मित्रता

💐राम सुग्रीव मित्रता 💐

मित्रता के मायने क्या है ? मित्रता के आदर्श क्या है ? पूरा संसार यह गुह्यविज्ञान तो प्रभुपाद श्रीराम से सीखे ! वीरवर हनुमान अपने गुप्तचर / दौत्य कर्म का समुचित निर्वहन कर सम्यक समाधान पश्चात सौमित्र सहित प्रभु श्रीराम को ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित सुग्रीव की सुरक्षित गुफा में ले आते है ! सामान्य शिष्टाचारी वार्तालाप पश्चात सीधे आगमन प्रयोजन पर संवाद होता है ! सुग्रीव प्रभुपाद से राजनैतिक संधि की आकांक्षा रखते है और तदनुसार ही प्रस्ताव रखते है ! प्रभुपाद उसे अस्वीकार कर मैत्री की बात करते है ! हनुमत काष्ठ पलकों को घिसकर अग्न्याधान कर मैत्री के रिश्ते को अग्निसाक्षी बनाते है ! प्रभुपाद सभी को मैत्री का मूल्य समझाते है ! तो अगर आप नही जानते है तो सुने ----
             "मैत्री में किसी वस्तु या सामान या संसाधन का आदान प्रदान नहीं होता बल्कि संसाधन का सामूहिक अधिकारपूर्वक उपयोग होता हूं! उपकार के उत्तर स्वरूप किसी प्रति उपकार की आशा नही की जाती ! मैत्री किसी वणिक का सौदा नहीं है जो मुद्रा के बदले वस्तु दे ! मैत्री में कोई पक्ष बड़ा या छोटा नहीं होता बल्कि बराबर होता है ! मैत्री में लिंग,रक्त,वंश,आयु और प्रतिष्ठा के मापदंड लागू नहीं होते ! किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह या राष्ट्र की किसी अन्य से मैत्री हो सकती है ! मैत्री में उपकार के बदले उपकार किया भी जा सकता है और नहीं भी ! प्रति उपकार हालात पर निर्भर होता है ! मैत्री का आधार स्वार्थ नहीं बल्कि प्रेम ,सद्भाव और समर्पण होता है ! मैत्री में प्यार/ प्रेम का विनिमय ही स्वीकृत है ! किसी अन्य का नहीं! मैत्री की आँखे सदैव बंद और हृदय सदैव खुला रहता है ! मैत्री मित्र को मन की आखों से ही देखती है ! मित्र का दुख खुद का दुख और मित्र का सुख खुद का सुख ! पृथक पृथक दैहिक शरीरों की एकात्म अनुभूति ही मैत्री है !  " 

प्रभुपाद राम केवल स्वार्थयुक्त राजनैतिक संधि ही चाहते तो परम सामर्थ्यवान महाराज बालि से करते न कि राज्य बहिष्कृत सुग्रीव से ! लेकिन प्रभुपाद राम संसार को मैत्री के असल प्रतिमान का पाठ पढ़ाते है ! श्रीराम प्रेम और मैत्री के भूखे है ! श्रीराम मन,वचन और कर्म से स्वच्छ और पवित्र है और उनका छल ,कपट और छिद्र से मुक्त है ! 

         भारत के सर्वोच्च आराध्य प्रभुपाद के पदचिन्हों पर चलने के लिए किसी उपदेश की आवश्यकता न होनी चाहिए क्योंकि स्वयं प्रभुपाद ने संसार को कोई उपदेश न दिया ! उनके द्वारा  समय समय पर किया कार्य व्यवहार और आचरण ही श्रेष्ठ और अनुकरणीय है और वही धर्म है ! सब चले धर्म के मार्ग पर ! जो सत्य में सत्य और सनातन है !

ताराचंद खेतावत
💐💐💐

Bandana

पक्षीराज गरुण और कागभुशुण्डि जी संवाद

*पक्षीराज गरुण और कागभुशुण्डि जी संवाद*

पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान कर कहिए॥

हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है, फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है।सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥

संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान्‌ पुण्य कौन सा है और सबसे महान्‌ भयंकर पाप कौन है॥

फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है।

*काकभुशुण्डिजी ने कहा-* 
हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥

ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥

जगत्‌ में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत्‌ में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥

संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥

किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। 

हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥
वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। 

दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥

और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥

शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥

जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥

जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। 

हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥

यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)॥

ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥

अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥

मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥
एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे?॥

नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥

इस प्रकार जगत्‌ में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुःखी हो रहे हैं। मैंने ये थो़ड़े से मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परंतु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही॥

प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिए जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परंतु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषय रूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥

*यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥*

*जय सियाराम जय जय हनुमान* 

🙏

Bandana

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

Soundproof hammer! Be positive India Keep thinking positive

Name: Prithwish Dutta, Class 12, Don Bosco High & Technical School
Location: Howrah, West Bengal
An idea of a soundproof hammer, which would not make any sound when struck against any object. The impact energy would be absorbed in the hammer itself, which will be covered with a foam like substance.
Enjoy it!

मंगलवार, 8 मार्च 2016

Portable latch for restrooms.... What and IDIA ..... Keep it up Be positive


Name: PS Senthur Balaji, Class 12, Maharishi International Residential School, Kanchipuram
Location: Erode, Tamil Nadu
An idea of a latch useful for people travelling frequently or in rural areas, which can be used for locking a door temporarily. This can be used in public restrooms or other places that lack latches.