बुधवार, 23 जून 2021

कठिन कार्य और दक्ष कार्य*

*कठिन कार्य और दक्ष कार्य*

मुकेश और अनिल, विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त होने के कुछ महीने बाद एक साथ एक ही कंपनी में काम करने लगे।

कुछ वर्षों के काम के बाद, उनके मैनेजर ने मुकेश को वरिष्ठ बिक्री मैनेजर के पद पर पदोन्नत [promotion] कर दिया, लेकिन अनिल अभी भी अपने प्रवेश स्तर, जूनियर बिक्री अधिकारी, के पद पर ही था। अनिल के मन में ईर्ष्या और असंतोष की भावना घर कर गई, लेकिन फिर भी उसने काम करना जारी रखा।

एक दिन अनिल को हीन भावना में लगने लगा कि अब वह मुकेश के साथ काम नहीं कर पायेगा। उसने अपना त्याग पत्र लिख दिया, लेकिन मैनेजर को सौंपने से पहले, उसने मैनेजर से शिकायत करी की वह, कड़ी मेहनत करने वाले कर्मचारियों को महत्व नहीं देते है, और पक्षपात करके लोगों को पदोन्नत कर देते है!

मैनेजर जानता था कि अनिल ने कंपनी में जितने साल बिताए थे, उन सालों में उसने बहुत मेहनत की है;  मुकेश से भी कठिन कार्य किया था और इसलिए वह पदोन्नति का पात्र तो था। अनिल को इस बात का एहसास कराने के लिए मैनेजर ने अनिल को एक कार्य सौंप दिया।

"जाओ और पता करो कि क्या कोई शहर में तरबूज बेच रहा है ?"

अनिल वापस आया और बोला, "हाँ! बेच रहा है।"

मैनेजर ने पूछा, " उन तरबूज की क्या कीमत है?"  अनिल पूछने के लिए शहर वापस चला गया और फिर मैनेजर को सूचित करने के लिए लौट आया;  "वे तरबूज 13.50 रूपये प्रति किलो कीमत के हैं।"

मैनेजर ने अनिल से कहा, "मैं मुकेश को यही काम दूँगा जो मैंने तुम्हें दिया था। कृपया उसकी प्रतिक्रिया पर ध्यान देंना। "

मैनेजर ने अनिल की मौजूदगी में मुकेश से कहा; "जाओ और पता करो कि क्या कोई शहर में तरबूज बेच रहा है?"

मुकेश पता लगाने गया और वापस लौटने पर उसने कहा:- "मैनेजर, पूरे शहर में तरबूज बेचने वाला केवल एक व्यक्ति है। प्रत्येक तरबूज की कीमत 49.00 रुपये है और आधा तरबूज के लिए 32.50 रुपये है। तरबूज की फांके काटकर वह उन्हें 13.50 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बेचता है। उसके पास अभी  93 तरबूज हैं, प्रत्येक का वजन लगभग 7kg है। इसके अलावा उसके पास एक खेत है और अगले 4 महीनों के लिए वो हमें 102 तरबूज प्रति दिन 27.00 रूपये प्रति तरबूज की दर से उपलब्ध कर सकता है जिसमें तरबूज के परिवहन {transportation] की कीमत भी शामिल हैं।

तरबूज अच्छी गुणवत्ता {quality} के साथ ताजा और लाल हैं और पिछले साल हमने जो खरबूजे बेचे थे, ये उनसे  स्वाद में यह बेहतर हैं। उसके पास अपनी तरबूज काटने की मशीन भी है और वह हमारे लिए मुफ्त में तरबूज की फांके करने को तैयार है।

हमें कल सुबह 10 बजे से पहले उसके साथ एक सौदा करने की जरूरत है और हम इस सौदे से पिछले साल के मुनाफे से 223000.00 रूपये ज्यादा कमा लेंगे। यह हमारे व्यापार के कुल प्रदर्शन [परफॉर्मेंस] में सकारात्मक योगदान देगा क्योंकि यह हमारे वर्तमान कुल बिक्री लक्ष्य में न्यूनतम 3.78% की वृद्धि करेगा।

मैंने इस जानकारी को लिखित रूप में प्रस्तुतिकरण [presentation] के रूप में तैयार कर दिया है। कृपया मुझे बताएं कि क्या आपको इसकी आवश्यकता है?  मैं इसे आपको पंद्रह मिनट में भेज सकता हूँ ।"

अनिल बहुत प्रभावित हुआ और उसे अपने और मुकेश के बीच अंतर का एहसास हो गया। उसने इस्तीफा नहीं देने का फैसला किया और मुकेश से सीखने का फैसला किया।

आइए इस कहानी से हम अपने सभी प्रयासों में एक अतिरिक्त  कदम आगे जाने के महत्व को जानें। आप अपने काम में पूरी क्षमता तभी दे सकते हैं जब आपका दिल उस काम से जुड़ा हो।

आपको वह काम करने के लिए इनाम नहीं  मिलता जो आपकी नौकरी का हिस्सा है। उसके लिए आपको केवल वेतन मिलता है।

आपको अतिरिक्त  प्रयास {extra efforts} और अपेक्षाओं से परे प्रदर्शन करने के लिए पुरस्कृत किया जाता है। दिल से काम करने के लिए काम में लगाव,प्यार व रुचि होनी जरूरी है। दिल से किये गए एक छोटे से प्रयास से सारा परिणाम बदल सकता है।

Bandana

शुक्रवार, 18 जून 2021

बेटा

*🌷 बेटा 🌷*

"माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।" तक़रीबन 32 साल के अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।

*"बेटा! तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या?" माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी।*

"माँ! मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।" सुदीप ने कहा।
"जैसी तेरी इच्छा!" मरी से आवाज़  में माँ बोली और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ 'प्रभा देवी' को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में!

वृद्धाश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर ज़िन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धाश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।
              
एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं। उनमें से एक ने कहा, "डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।"

वहाँ बैठी एक महिला बोली, "प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी तब सुदीप कुल चार साल का था। पति की मौत के बाद प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये। किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।"

वृद्धाश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया और कहा, "सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो?"

"माँ! अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ" सुदीप का जवाब था।
             
तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, "मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा!"

इस प्रकार तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धाश्रम के लोग भी कहने लगे कि, देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया!

आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, "मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"

किसी और बुजुर्ग ने कहा, "मगर वो तो शादीशुदा भी नहीं था।"

"अरे होगी उसकी कोई 'गर्ल-फ्रेण्ड' जिसने कहा होगा पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।"

दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।
             
दो साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, "इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो। हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।"

"इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ? उसे मरे तो तीन साल हो गये।" 

शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये।

उनमें से एक बोला, "अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था?"

 "वो मोबाईल तो मेरे पास है जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।" शर्मा जी बोले।

"पर ऐसा क्यों ?" किसी ने पूछा।

शर्मा जी बोले कि, करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, "शर्मा जी! मुझे 'ब्लड कैंसर' हो गया है और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी। मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी। वो तो जीते जी ही मर जायेगी। *मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे।* मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा 'फ्लेट' और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।"

यह दास्ताँ सुन वहाँ पर उपस्थित लोगों की आँखें झलझला आयीं।

प्रभा देवी का अन्तिम संस्कार आश्रम के ही एक हिस्से में कर दिया गया। उनके अन्तिम संस्कार में शर्मा जी ने आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के परिवार वालों को भी बुलाया। 

माँ-बेटे की अनमोल और अटूट प्यार की दास्ताँ का ही असर था !

इस कहानी को पढ़ते हुए आप के मन के विचार कितनी बार बदले जरा सोचिये।

*हरबार जैसा हम सोचते है, जो तर्क करते है, जरूरी नहीb की वास्तविकता वही हो।*

Bandana

गुरुवार, 17 जून 2021

इंसानियत अभी जिंदा है

*💐इंसानियत अभी जिंदा है💐*

एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला~ ''साहब! बूट पॉलिश ?''

उसकी दयनीय सूरत देखकर उन्होंने अपने जूते आगे बढ़ा दिये, बोले- ''लो, पर ठीक से चमकाना।''

लड़के ने काम तो शुरू किया परंतु अन्य पॉलिशवालों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी।

वे बोले~ ''कैसे ढीले-ढीले काम करते हो? जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ !'' 

वह लड़का मौन रहा। 

इतने में दूसरा लड़का आया। उसने इस लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट काम में जुट गया। पहले वाला गूँगे की तरह एक ओर खड़ा रहा। दूसरे ने जूते चमका दिये।

'पैसे किसे देने हैं?' इस पर विचार करते हुए उन्होंने जेब में हाथ डाला। उन्हें लगा कि 'अब इन दोनों में पैसों के लिए झगड़ा या मारपीट होगी।' फिर उन्होंने सोचा, 'जिसने काम किया, उसे ही दाम मिलना चाहिए।' इसलिए उन्होंने बाद में आनेवाले लड़के को पैसे दे दिये।

उसने पैसे ले तो लिये परंतु पहले वाले लड़के की हथेली पर रख दिये। प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया।

वह आदमी विस्मित नेत्रों से देखता रहा। उसने लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा~  ''यह क्या चक्कर है?''

लड़का बोला~ ''साहब! यह तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं। ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया नहीं तो इसकी वृद्धा माँ और बहनों का क्या होता,बहुत स्वाभिमानी है... भीख नहीं मांग सकता....!''

फिर थोड़ा रुककर वह बोला ~ ''साहब! यहाँ जूते पॉलिश करनेवालों का हमारा समूह है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं जिन्हें सब 'सत्संगी चाचाजी' कहकर पुकारते हैं। वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी सत्संग की बातें बताते रहते हैं। उन्होंने ही ये सुझाव रखा कि 'साथियो! अब यह पहले की तरह स्फूर्ति से काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ???

ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना, स्नेह, सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकट करने का एक अवसर दिया है।जैसे पीठ, पेट, चेहरा, हाथ, पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही शरीर के अंग, ऐसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी हैं एक ही आत्मा! हम सब एक हैं।

स्टेशन पर रहने वाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी करेंगे।''

जूते पॉलिश करनेवालों के दल में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊँचाई देखकर वे सज्जन चकित रह गये औऱ खुशी से उसकी पीठ थपथपाई...औऱ सोचने लगे शायद इंसानियत अभी तक जिंदा है.....!!

Bandana

बुधवार, 16 जून 2021

गुस्से को शान्त करने का एक सुंदर उदाहरण

एक सुन्दर पोस्ट जो कहीं से प्राप्त हुई, 
ज्यों की त्यों प्रेषित है...

गुस्से को शान्त करने का एक सुंदर उदाहरण-

एक वकील का सुनाया हुआ 
एक हृदयस्पर्शी किस्सा -

"मै अपने चेंबर में बैठा हुआ था, 
एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा।
उसके हाथ में कागज़ो का बंडल, 
धूप में काला हुआ चेहरा, 
बढ़ी हुई दाढ़ी, सफेद कपड़े जिनके पांयचों के पास मिट्टी लगी थी।"

उसने कहा - "उसके पूरे फ्लैट पर स्टे लगाना है, बताइए, क्या क्या कागज और चाहिए... 
क्या लगेगा खर्चा... "

मैंने उन्हें बैठने का कहा - 

"रघु, पानी दे इधर" मैंने आवाज़ लगाई!

वो कुर्सी पर बैठे!

उनके सारे कागजात मैंने देखे, 
उनसे सारी जानकारी ली, 
आधा पौना घंटा गुजर गया।

"मै इन कागज़ो को देख लेता हूँ ,
फिर आपकी केस पर विचार करेंगे। 
आप ऐसा कीजिए, 
अगले शनिवार को मिलिए मुझसे।" 

चार दिन बाद वो फिर से आए- !
वैसे ही कपड़े
बहुत डेस्परेट लग रहे थे

अपने छोटे भाई पर गुस्सा थे बहुत!
 
मैंने उन्हें बैठने का कहा,

वो बैठे!

ऑफिस में अजीब सी खामोशी गूंज रही थी।

मैंने बात की शुरुआत की ! -
"बाबा, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए।
और आपके परिवार के बारे में और आपकी निजी जिंदगी के बारे में भी मैंने 
बहुत जानकारी हासिल की।
मेरी जानकारी के अनुसार:
आप दो भाई है, एक बहन है,
आपके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए।
बाबा आप नौवीं पास है 
और आपका छोटा भाई इंजिनियर है।
आपने  छोटे भाई की पढ़ाई के लिए आपने स्कूल छोड़ा, लोगो के खेतों में दिहाड़ी पर काम किया,
 कभी अंग भर कपड़ा और पेट भर खाना आपको नहीं मिला फिर भी भाई के पढ़ाई के लिए पैसों की कमी आपने नहीं होने दी।

एक बार खेलते खेलते भाई पर किसी बैल ने सींग घुसा दिए तब भाई लहूलुहान हो गया।
फिर आपने उसे कंधे पर उठा कर 5 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल लेे गए। 
सही देखा जाए तो आपकी उम्र भी नहीं थी 
ये समझने की, 
पर भाई में जान बसी थी आपकी।
माँ बाप के बाद मै ही इन का माँ-बाप… 
ये भावना थी आपके मन में।

फिर आपका भाई इंजीनियरिंग में 
अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले पाया 
और आपका दिल खुशी से भरा हुआ था।
फिर आपने जी तोड़ मेहनत की।
 80,000 की सालाना फीस भरने के लिए आपने रात दिन एक कर दिया यानि बीवी के गहने गिरवी रख के, कभी साहूकार कार से पैसा ले कर आपने उसकी हर जरूरत पूरी की।
फिर अचानक उसे किडनी की तकलीफ शुरू हो गई, डॉक्टर ने किडनी निकालने का कहा 
और
तुम ने अगले मिनट में अपनी किडनी उसे दे दी यह कह कर कि कल तुझे अफसर बनना है,
नौकरी करनी है, 
कहाँ कहाँ घूमेगा बीमार शरीर लेे के। 
मुझे गाँव में ही रहना है, 
ये कह कर किडनी दे दी उसे।

फिर भाई मास्टर्स के लिए हॉस्टल पर रहने गया।लड्डू बने, देने जाओ, खेत में मकई खाने तैयार हुई, भाई को देने जाओ, 
कोई तीज त्योहार हो, भाई के कपड़े बनाओ।
घर से हॉस्टल 25 किलोमीटर तुम उसे डिब्बा देने साइकिल पर गए।
हाथ का निवाला पहले भाई को खिलाया तुमने।
फिर वो मास्टर्स पास हुआ, 
तुमने गाँव को खाना खिलाया।
फिर उसने उसी के कॉलेज की लड़की जो दिखने में एकदम सुंदर थी से शादी कर ली ,
तुम सिर्फ समय पर ही वहाँ गए।
भाई को नौकरी लगी, 
3 साल पहले उसकी शादी हुई, 
अब तुम्हारा बोझ हल्का होने वाला था।
पर किसी की नज़र लग गई 
आपके इस प्यार को।
शादी के बाद भाई ने आना बंद कर दिया। 
पूछा तो कहता है मैंने बीवी को वचन दिया है।
घर पैसा देता नहीं, 
पूछा तो कहता है कर्ज़ा सिर पे है।
पिछले साल शहर में फ्लैट खरीदा।
पैसे कहाँ से आए पूछा तो कहता है 
कर्ज लिया है।
मैंने मना किया तो कहता है भाई, 
तुझे कुछ नहीं मालूम, 
तू निरा गवार ही रह गया।
अब तुम्हारा भाई चाहता है 
गाँंव की आधी खेती बेच कर उसे पैसा दे दे।
इतना कह के मैं रुका - रघु की लाई चाय की प्याली मैंने मुँह से लगाई -!
"तुम चाहते हो भाई ने जो मांगा 
वो उसे ना दे कर उसके ही फ्लैट पर 
स्टे लगाया जाए - क्यों यही चाहते हो तुम..." 

वो तुरंत बोला, "हां"

मैंने कहा - हम स्टे लेे सकते है, 
भाई के प्रॉपर्टी में हिस्सा भी माँग सकते हैं

                            पर….

1) तुमने उसके लिए जो खून पसीना एक किया है वो नहीं मिलेगा!

2) तुम्हारीे दी हुई किडनी वापस नहीं मिलेगी!

3) तुमने उसके लिए जो ज़िन्दगी खर्च की है 
वो भी वापस नहीं मिलेगी।

मुझे लगता है इन सब चीजों के सामने 
उस फ्लैट की कीमत शून्य है।
 
तुम्हारे भाई की नीयत फिर गई, 
वो अपने रास्ते चला गया ;
अब तुम भी उसी कृतघ्न सड़क पर मत जाओ।

वो भिखारी निकला,

तुम दिलदार थे।

दिलदार ही रहो …..

तुम्हारा हाथ ऊपर था,

ऊपर ही रखो।

कोर्ट कचहरी करने की बजाय 
बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ।
पढ़ाई कर के तुम्हारा भाई बिगड़ गया ,
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि 
तुम्हारे बच्चे भी ऐसा करेंगे..."

वो मेरे मुँह को ताकने लगा।

उठ के खड़ा हुआ, सब काग़ज़ात उठाए 
और आँखे पोछते हुए बोला - 
"चलता हूँ, वकील साहब।" 

उसकी रूलाई फुट रही थी और वो 
मुझे  दिख ना जाए ऐसी कोशिश कर रहा था।

इस बात को अरसा गुजर गया!
                    
कल वो अचानक मेरे ऑफिस में आया।
कलमों में सफेदी झाँक रही थी उसके। 
साथ में एक नौजवान था और हाथ में थैली।

मैंने कहा- "बाबा, बैठो"

उसने कहा, "बैठने नहीं आया वकील साहब, मिठाई खिलाने आया हूँ । 
ये मेरा बेटा, बैंक मैनेजर है !
बैंगलोर रहता है, कल आया गाँव।
अब तीन मंजिला मकान बना लिया है वहाँ।
थोड़ी थोड़ी कर के 10–12 एकड़ खेती की जमीन खरीद ली अब।"

मै उसके चेहरे से टपकते हुए खुशी को 
महसूस कर रहा था
"वकील साहब, आपने मुझे कहा था-  
कोर्ट कचहरी के चक्कर में मत पड़ो !"
आपने बहुत नेक सलाह दी 
और मुझे उलझन से बचा लिया।
जबकि गाँव में सब लोग मुझे 
भाई के खिलाफ उकसा रहे थे।
मैंने उनकी नहीं, आपकी बात सुन ली 
और मैंने अपने बच्चो को लाइन से लगाया और भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद नहीं होने दी।
कल भाई और उनकी पत्नी भी घर आए थे।
 पाँव छू छूकर माफी मांगने लगे।
मैंने अपने भाई को गले से लगा लिया।
और मेरी धर्मपत्नी ने उसकी धर्मपत्नी को 
गले से लगा लिया।
हमारे पूरे परिवार ने बहुत दिनों बाद 
एक साथ भोजन किया।
बस फिर क्या था आनंद की लहर 
घर में दौड़ने लगी।

मेरे हाथ का पेडा हाथ में ही रह गया
 
मेरे आंसू टपक ही गए आखिर. .. .

गुस्से को योग्य दिशा में मोड़ा जाए 
तो पछताने की जरूरत नहीं पड़े कभी

बहुत ही अच्छा है इस को समझना 
और अमल में लाना चाहिए।
यह एक सच्ची घटना है 
शिक्षाप्रद है और बेमिसाल भी है!

Bandana

सोमवार, 14 जून 2021

मिडिल-क्लास

लिखने वाले ने बहुत ही गज़ब का लिखा है। बहुत  बारीकी से observations किये हैं

👌👌👌👌👌
       "मिडिल-क्लास"  का होना भी
        किसी वरदान से कम नहीं है.
          कभी बोरियत नहीं होती.

      जिंदगी भर कुछ ना कुछ आफत
           लगी ही रहती है.

    मिडिल क्लास वालों की स्थिति 
        सबसे दयनीय होती है,

न इन्हें तैमूर जैसा बचपन नसीब होता है 
  न अनूप जलोटा जैसा बुढ़ापा, फिर भी 
         अपने आप में उलझते हुए
                व्यस्त रहते हैं.
       मिडिल क्लास होने का भी 
           अपना फायदा है.
  चाहे BMW का भाव बढ़े या AUDI का 
  या फिर नया i phone लाँच हो जाये,
         कोई फर्क नहीं पड़ता.
        मिडिल क्लास लोगों की 
   आधी जिंदगी तो ... झड़ते हुए बाल
     और बढ़ते हुए पेट को रोकने में ही 
                  चली जाती है.

इन घरों में पनीर की सब्जी तभी बनती है,
  जब दूध गलती से फट जाता है, और 
 मिक्स-वेज की सब्ज़ी भी तभी बनती हैं 
   जब रात वाली सब्जी बच जाती है.

      इनके यहाँ फ्रूटी, कोल्ड ड्रिंक 
 एक साथ तभी आते हैं , जब घर में कोई 
   बढ़िया वाला रिश्तेदार आ रहा होता है.
       मिडिल क्लास वालों के यहाँ
            कपड़ों की तरह ही 
        खाने वाले चावल की भी 
          तीन वेराईटी होती है ~
    डेली, कैजुवल और पार्टी वाला.

   छानते समय चायपत्ती को दबा कर
     लास्ट बून्द तक निचोड़ लेना ही 
     मिडिल क्लास वालों के लिए
    परमसुख की अनुभुति होती है.

    ये लोग रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल 
             नहीं करते, सीधे 
         अगरबत्ती जला लेते हैं.
   मिडिल क्लास भारतीय परिवार के
     घरों में  Get together नहीं होता,
      यहाँ 'सत्यनारायण भगवान की'
               कथा होती है.

      इनका फैमिली बजट इतना
   सटीक होता है, कि सैलरी अगर 
    31 के बजाय 1 को आये, तो 
      गुल्लक फोड़ना पड़ जाता है.
         मिडिल क्लास लोगों की 
            आधी ज़िन्दगी तो 
       "बहुत महँगा है"  बोलने में ही 
               निकल जाती है.

        इनकी "भूख" भी ... 
   होटल के रेट्स पर डिपेंड करती है. 
                दरअसल ....
      महंगे होटलों की मेन्यू-बुक में 
           मिडिल क्लास इंसान
       'फूड-आइटम्स' नहीं बल्कि 
    अपनी "औकात" ढूंढ रहा होता है.
             इश्क-मोहब्बत तो 
           अमीरों के चोंचले हैं.
      मिडिल क्लास वाले तो सीधे 
             "ब्याह" करते हैं.

          इनके जीवन में कोई
          वैलेंटाइन नहीं होता.
       "जिम्मेदारियाँ"  जिंदगी भर
   बजरंग-दल सी ... पीछे लगी रहती हैं.

     मध्यम वर्गीय दूल्हा-दुल्हन भी 
   मंच पर ऐसे बैठे रहते हैं मानो जैसे 
         किसी भारी सदमे में हों.

          अमीर शादी के बाद
      हनीमून पर चले जाते हैं , और 
  मिडिल क्लास लोगों की शादी के बाद 
           टेन्ट बर्तन वाले ही
        इनके पीछे पड़ जाते हैं.

         मिडिल क्लास बंदे को 
       पर्सनल बेड और रूम भी 
  शादी के बाद ही अलाॅट हो पाता है.
 मिडिल क्लास ... बस ये समझ लो कि 
   जो तेल सर पे लगाते हैं , वही तेल
        मुँह पर भी रगड़ लेते हैं.

    एक सच्चा मिडिल क्लास आदमी
              गीजर बंद करके 
       तब तक नहाता रहता है 
         जब तक कि नल से 
   ठंडा पानी आना शुरू ना हो जाए.

  रूम ठंडा होते ही AC बंद करने वाला
 मिडिल क्लास आदमी चंदा देने के वक्त 
       नास्तिक हो जाता है, और 
    प्रसाद खाने के वक्त आस्तिक.
      दरअसल मिडिल-क्लास तो 
   चौराहे पर लगी घण्टी के समान है, 
     जिसे लूली-लगंड़ी, अंधी-बहरी, 
           अल्पमत-पूर्णमत 
        हर प्रकार की सरकार 
        पूरा दम से बजाती है.
 मिडिल क्लास को आज तक बजट में 
     वही मिला है, जो अक्सर हम
     🔔  मंदिर में बजाते हैं. 🔔

        फिर भी हिम्मत करके 
          मिडिल क्लास आदमी 
             पैसा बचाने की
       बहुत कोशिश करता है,
                 लेकिन 
      बचा कुछ भी नहीं पाता.
   हकीकत में मिडिल मैन की हालत 
         पंगत के बीच बैठे हुए
     उस आदमी की तरह होती है 
       जिसके पास पूड़ी-सब्जी 
   चाहे इधर से आये, चाहे उधर से
         उस तक आते-आते 
           खत्म हो जाती है.
      मिडिल क्लास के सपने भी
             लिमिटेड होते हैं.
 "टंकी भर गई है, मोटर बंद करना है"
      गैस पर दूध उबल गया है,
        चावल जल गया है,
    इसी टाईप के सपने आते हैं.

     दिल में अनगिनत सपने लिए 
         बस चलता ही जा ता है ...
                 चलता ही जाता है.

Bandana

सच्चा मंत्र

*सच्चा मंत्र*

एक गरीब औरत एक साधु के पास गई,"स्वामी जी! कोई ऐसा पवित्र मन्त्र लिख दीजिये जिससे मेरे बच्चों का रात को भूख से रोना बन्द हो जाये...।" 

साधु ने कुछ पल एकटक आकाश की ओर देखा फिर अपनी कुटिया में अन्दर गया और एक पीले कपड़े पर एक मन्त्र लिखकर उसे ताबीज की तरह लपेट-बाँधकर उस महिला को दे दिया।

साधु ने कहा, "इस मन्त्र को घर में उस जगह रखना, जहाँ नेक कमाई का धन रखती हो।" महिला खुश होकर चली गई।

ईश्वर कृपा से उस उसके पति की आमदनी ठीक हुई और बच्चों को भोजन मिल गया। रात शान्ति से कट गई। अगले रोज़ भोर में ही उन्हें पैसों से भरी एक थैली घर के आंगन में मिली। थैली में धन के अलावा एक पर्चा भी निकला, जिस पर लिखा था, कोई कारोबार कर लें...।

इस बात पर अमल करते हुवे उस औरत के पति ने एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली और काम शुरू किया। धीरे धीरे कारोबार बढ़ा, तो दुकानें भी बढ़ती गईं...। जैसे पैसों की बारिश सी होने लगी...।

पति की कमाई तिजोरी में रखते समय एक दिन उस महिला की नज़र उस मन्त्र लिखे कपड़े पर पड़ी...। "न जाने, साधु महाराज ने ऐसा कौन सा मन्त्र लिखा था कि हमारी सारी गरीबी दूर हो गई?" सोचते सोचते उसने वह मन्त्र वाला कपड़ा खोल डाला...।

लिखा था कि:
*जब पैसों की तंगी ख़त्म हो जाये, तो सारा पैसा तिजोरी में छिपाने की बजाय कुछ पैसे ऐसे घर में डाल देना जहाँ से रात को बच्चों के रोने की आवाज़ें आती हों..!!*

स्वस्थ रहें! सुरक्षित रहें! खुश रहें! व्यस्त रहें!

Bandana

शनिवार, 12 जून 2021

आपका औहदा क्या था या क्या है, यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए🙏🙏

*पराजय*
    जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद जब ज्वाइन किया..तो जानकारी हुई की ये जिला ..स्कूली शिक्षा के लिहाज से बहुत पिछड़ा हुआ हैं...वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कहा आप ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान दें..
    बस तय कर लिया..महीने में आठ दस दिन जरूर ग्रामीण स्कूलों को दूंगा..
        शीघ्र ही..ग्रामीण इलाकों में दौरों का सिलसिला चल निकला..पहाड़ी व जंगली इलाका भी था कुछ..
    एक दिन मातहत कर्मचारियों से मालूम हुआ..
  "बड़ेरी " नामक गांव, जो एक पहाड़ी पर स्थित है..वहां के स्कूल में कोई शिक्षा अधिकारी नहीं जाता था क्योंकि वहां पहुंचने के लिए.. वाहन छोड़कर..लगभग दो तीन किलोमीटर जंगली रास्ते से पैदल ही जाना होता था ..
       तय कर लिया अगले दिन वहां जाया जाए..
वहां कोई ,मिस्टर  पी. के. व्यास हेड मास्टर थे.. जो बरसों से, पता नहीं क्यूं.. वहीं जमे हुए थे..! मैंने निर्देश दिए उन्हें कोई अग्रिम सूचना न दी जाय..सरप्राइज विजिट होगी..!
   अगले दिन हम सुबह निकले.. दोपहर बारह बजे..ड्राइवर ने कहा साहब यहां से आगे..पहाड़ी पर पैदल ही जाना होगा दो तीन किलोमीटर..
      मै और दो अन्य कर्मचारी पैदल ही चल पड़े..
लगभग डेढ़ घंटे सकरे..पथरीले जंगली रास्ते से होकर हम ऊपर गांव तक पहुंचे..सामने स्कूल का पक्का भवन था..और लगभग दो  सौ कच्चे पक्के मकान थे..
    स्कूल साफ सुथरा और व्यवस्थित रंगा पुता हुआ था..बस तीन कमरे और प्रशस्त बरामदा..चारों तरफ सुरम्य हरा भरा वन..
      अंदर क्लास रूम में पहुंचे तो तीन कक्षाओं में लगभग सवा सौ बच्चे तल्लीनता पूर्वक पढ़ रहे थे.. हालांकि शिक्षक कोई भी नहीं था..एक बुजुर्ग सज्जन बरामदे में थे जो वहां नियुक्त चपरासी थे.शायद...
     उन्होंने बताया हेड मास्टर साहब आते ही होंगे..
 हम बरामदे में बैठ गए थे..तभी देखा एक चालीस बयालीस वर्ष के सज्जन..अपने दोनो हाथो में पानी की बाल्टियां लिए ऊपर चले आ रहे थे..पायजामा घुटनों तक चढ़ाया हुआ था..ऊपर खादी का कुर्ता जैसा था..!
      उन्होंने आते ही परिचय दिया.. मैं प्रशांत व्यास यहां हेड मास्टर हूं..। यहां इन दिनों ..बच्चों के लिए पानी, थोड़ा नीचे जाकर कुंए से लाना होता है..हमारे चपरासी दादा..बुजुर्ग हैं अब उनसे नहीं होता..इसलिए मै ही लेे आता हूं..वर्जिश भी हो जाती है..वे मुस्कुराकर बोले..
   उनका चेहरा पहचाना सा लगा और नाम भी..
मैंने उनकी और देखकर पूछा..तुम प्रशांत व्यास हो..इंदौर से.. गुजराती कॉलेज..!
      मैंने हेट उतार दिया था.. उसने कुछ पहचानते हुए .. चहकते हुए कहा..आप अभिनव.. हैं, अभिनव श्रीवास्तव..! मैंने कहा और नहीं तो क्या.. भई..!
       लगभग बीस बाईस बरस पहले हम इंदौर में साथ ही पढ़े थे..बेहद होशियार और पढ़ाकू था  वो..बहुत कोशिश करने के बावजूद शायद ही कभी उससे ज्यादा नंबर आए हों.. मेरे..!
         एक प्रतिस्पर्धा रहती थी हमारे बीच..जिसमें हमेशा वही जीता करता था..
      आज वो हेड मास्टर था और मैं..जिला शिक्षा अधिकारी.. पहली बार उससे आगे निकलने.. जीतने.. का भाव था.. और सच कहूं तो खुशी थी मन में..
       मैंने सहज होते हुए पूछा.. यहां कैसे पहुंचे.. भई..?. और कौन कौन है घर पर..? 
             उसने विस्तार से बताना शुरू किया..
  " एम. कॉम करते समय ही बाबूजी की मालवा मिल वाली नौकरी जाती रही थी..फिर उन्हें दमे की बीमारी भी तो थी..! ..घर चलाना मुश्किल हो गया था..किसी तरह पढ़ाई पूरी की.. नम्बर अच्छे  थे.. इसलिए संविदा शिक्षक की नियुक्ति मिल गई थी..जो छोड़ नहीं सकता था..आगे पढ़ने की न गुंजाइश थी न स्थितियां..इस गांव में पोस्टिंग मिल गई..मां बाबूजी को  लेकर यहां चला आया..सोचा गांव में कम पैसों में गुजारा हो ही जायेगा..!"
       फिर उसने हंसते हुए कहा.. "इस दुर्गम गांव में पोस्टिंग..और वृद्ध.. बीमार मां बाप को देख..कोई लड़की वाले लड़की देने तैयार नहीं हुए..इसलिए विवाह नहीं हुआ..और ठीक भी है.. कोई पढ़ी लिखी लड़की  भला यहां क्या करती..! 
         अपनी कोई पहुंच या पकड़ भी नहीं थी कि यहां से ट्रांसफर करा पाते..तो बस यहीं जम गए..यहां आने के कुछ बरस बाद..मां बाबूजी दोनों ही चल बसे..
  यथा संभव उनकी सेवा करने का प्रयास किया..
अब यहां बच्चों में..स्कूल में मन रम गया है..
  छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर.. आस पास की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण करने चला जाता हूं...
.. ..रोज शाम को स्कूल के बरामदे में बुजुर्गों को पढ़ा देता हूं..अब शायद इस गांव में कोई निरक्षर नहीं है..नशा मुक्ति का अभियान भी चला रक्खा है..अपने हाथों से खाना बना लेता हूं..और किताबें पढ़ता हूं.. बच्चों को अच्छी बुनियादी शिक्षा.. अच्छे संस्कार मिल जाएं..अनुशासन सीखें बस यही ध्येय है.. मै सी ए नहीं कर सका पर मेरे दो विद्यार्थी सी ए हैं..और कुछ अच्छी नौकरी में भी..।
     .. मेरा यहां कोई ज्यादा खर्च है नहीं.. मेरी ज्यादातर तनख़ा इन बच्चों के खेल कूद और स्कूल पर खर्च हो जाती हैं...तुम तो जानते हो कॉलेज के जमाने से क्रिकेट खेलने का जुनून था..! वो बच्चों के साथ खेल कर पूरा हो जाता है..बड़ा सुकून मिलता है.."
      मैंने टोकते हुए कहा...मां बाबूजी के बाद शादी का विचार नहीं आया..?
   उसने मुस्कुराते हुए कहा.." दुनियां में सारी अच्छी चीजें मेरे लिये नहीं बनी है..
   इसलिए जो सामने है..उसी को अच्छा करने या बनाने की कोशिश कर रहा हूं.."
    फिर अपने परिचित दिलचस्प अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला.".अरे वो फ़ैज़ साहेब की एक नज़्म में है न..! .."अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो..अब यहां कोई नहीं..कोई नहीं आएगा.."
      उसकी उस बेलौस हंसी ने भीतर तक भिगो दिया था..
    लौटते हुए मैंने उससे कहा..प्रशांत तुम जब चाहो तुम्हारा ट्रांसफर मुख्यालय या जहां तुम चाहो करा दूंगा..
      उसने मुस्कुराते हुए कहां..अब बहुत देर हो चुकी है.जनाब.. अब यहीं इन लोगों के बीच खुश हूं..कहकर उसने हाथ जोड़ दिए..
      मेरी अपनी उपलब्धियों से उपजा दर्प..उससे आगे निकल जाने का अहसास..भरम.. चूर चूर हो गया था..
    वो अपनी जिंदगी की तमाम कमियों.. तकलीफों..असुविधाओं के बावजूद सहज था. उसकी कर्तव्यनिष्ठा देखकर.. मै हतप्रभ था ..जिंदगी से..किसी शिकवे या.. शिकायत की कोई झलक उसके व्यवहार में...नहीं थी..
    सुखसुविधाओं..उपलब्धियों.. ओहदों के आधार पर हम लोगों का मूल्यांकन करते हैं..लेकिन वो इन सब के बिना मुझे फिर पराजित कर गया था..!
  लौटते समय उस कर्म ऋषि को हाथ जोड़कर..भरे मन से इतना ही कह सका..तुम्हारे इस पुनीत कार्य में कभी मेरी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना मित्र.         
       
             💥जीवन दर्शन💥
 आपका औहदा क्या था या क्या है, यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए🙏🙏

डीएवी सिवान के प्राचार्य श्री  बी आनंद के कलम से

Bandana

शुक्रवार, 11 जून 2021

अंतिम राय तभी बनाये और कोई टिप्पणी तभी करें, जब आपके पास पूरी जानकारी हो।

🙏 मनीष ने 1 घंटे में 10 किमी की दूरी तय की, अनीश ने उतनी ही दूरी डेढ़ घंटे में तय की।

दोनों में से कौन तेज और स्वस्थ हुआ?

बेशक हमारा जवाब होगा मनीष।

क्या होगा यदि हम कहें कि मनीष ने इस दूरी को तैयार ट्रैक पर तय किया जबकि अनीश ने रेतीले रास्ते पर चल कर किया ?

तब हमारा जवाब होगा " अनीश।"
 
लेकिन हमें पता चला कि मनीष 50 साल के हैं जबकि अनीश 25 साल के हैं?

तब हमारा जवाब फिर से "मनीष" होगा।

लेकिन हमें यह भी पता चला कि अनीश का वजन 140 किलो था जबकि मनीष का वजन 65 किलो था।

दोबारा हमारा जवाब होगा  " अनीश" ।

जैसे-जैसे हम अनीश और मनीष के बारे में और जानेंगे, बेहतर कौन है, इस बारे में हमारी राय और निर्णय बदलते जाएंगे।

हम बहुत सतही तरीके से और जल्दबाजी में राय बनाते हैं जिसकी वजह से हम अपने और दूसरों के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं।
 
अंतिम राय तभी बनाये और  कोई टिप्पणी तभी करें, जब आपके पास पूरी जानकारी हो। 

सकारात्मक रहें, निर्माण करें, जिंदगी बहुत खूबसूरत है।   🙏

Bandana

बुधवार, 9 जून 2021

मिलजुल कर इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद करें।

जब टाईटेनिक समुन्द्र में डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफिरों को बचा सकते थे।
सबसे करीब जो जहाज़ मौजूद था उसका नाम SAMSON था और वो हादसे के वक्त टाईटेनिक से सिर्फ सात मील की दूरी पर था।
SAMSON के कैप्टन ने न सिर्फ टाईटेनिक की ओर से फायर किए गए सफेद शोले (जो कि बेहद खतरे की हालत में हवा में फायर किये जाते हैं।) देखे थे, बल्कि टाईटेनिक के मुसाफिरों के चिल्लाने के आवाज़ को भी सुना भी था। लेकिन सैमसन के लोग गैर कानूनी तौर पर बेशकीमती समुन्द्री जीव का शिकार कर रहे थे और नहीं चाहते थे कि पकड़े जाएं, अपने जहाज़ को दूसरी तरफ़ मोड़ कर चले गए।

यह जहाज़ हम में से उन लोगों की तरह है जो अपनी गुनाहों भरी जिन्दगी में इतने मग़न हो जाते हैं कि उनके अंदर से इनसानियत खत्म हो जाती है।

दूसरा जहाज़ जो करीब मौजूद था उसका नाम CALIFORNIAN था, जो हादसे के वक्त टाईटेनिक से चौदह मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने भी टाईटेनिक की ओर से निकल रहे सफेद शोले अपनी आखों से देखे,  क्योंकि टाईटेनिक उस वक्त बर्फ़ की चट्टानों से घिरा हुआ था और उसे उन चट्टानों के चक्कर काट कर जाना पड़ता, इसलिए वो कैप्टन सुबह होने का इन्तजार करने लगा।और जब सुबह वो टाईटेनिक की लोकेशन पर पहुंचा तो टाईटेनिक को समुन्द्र की तह मे पहुचे हुए चार घंटे गुज़र चुके थे और टाईटेनिक के कैप्टन Adword_Smith  समेत 1569 मुसाफिर डूब चुके थे।

यह जहाज़ हम लोगों मे से उनकी तरह है जो किसी की मदद करने के लिए अपनी सहूलियत और आसानी देखते हैं और अगर हालात सही न हों तो अपना फ़र्ज़ भूल जाते हैं।

तीसरा जहाज़ CARPHATHIYA था जो टाईटेनिक से 68 मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने रेडियो पर टाईटेनिक के मुसाफारों की चीख पुकार सुनी, जबकि उसका जहाज़ दूसरी तरफ़ जा रहा था, उसने फौरन अपने जहाज़ का रुख मोड़ा और बर्फ़ की चट्टानों और खतरनाक़ मौसम की परवाह किए बगैर मदद के लिए रवाना हो गया। हालांकि वो दूर होने की वजह से टाईटेनिक के डूबने के दो घंटे बाद लोकेशन पर पहुच सका लेकिन यही वो जहाज़ था, जिसने लाईफ बोट्स की मदद से टाईटेनिक के बाकी 710 मुसाफिरों को जिन्दा बचाया था और उन्हें हिफाज़त के साथ न्यूयार्क पहुचा दिया था।
उस जहाज़ के कैप्टन "आर्थो रोसट्रन " को ब्रिटेन की तारीख के चंद बहादुर कैप्टनों में शुमार किया जाता है और उनको कई सामाजिक और सरकारी आवार्ड से भी नवाजा गया था।

हमारी जिन्दगी में हमेशा मुश्किलें रहती हैं, चैलेंज रहते हैं लेकिन जो इन मुश्किल और चैलेंज का सामना करते हुए भी इन्सानियत की भलाई के लिए कुछ कर जाए वही सच्चा इन्सान है। 

आज के माहौल में जिस किसी ने भी अपनी सामर्थ्य अनुसार किसी की मदद की है, समझो विश्व रूपी टाइटैनिक के डूबने से पहले उसने जिंदगियां बचाने का पुण्य प्राप्त किया है। अभी संकट दूर नहीं हुआ है। अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है। आओ मिलजुल कर इस मुश्किल घड़ी में एक दूसरे की मदद करें।
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Bandana

शब्दों का विष

शब्दों का विष 

18 दिन के युद्ध ने द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था।
शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी !
नगर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था।
पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ते था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे।
उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को ताक रही थी। 

तभी श्रीकृष्ण कक्ष में प्रविष्ट होते हैं।
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण उसके सर को सहलाते रहते हैं एवं रोने देते हैं।

थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं। 

द्रौपदी: 
"यह क्या हो गया सखा?? ऐसा तो नहीं सोचा था।"

कृष्ण: 
"नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली,वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती।
हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है।
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थीं और तुम सफल हुई, द्रौपदी।
तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ।सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,सारे कौरव समाप्त हो गए।तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।"

द्रौपदी:
"सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए?"

कृष्ण: "नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से परिचित कराने के लिए आया हूँ। 
हमारे कर्मों के परिणाम को हम दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं तो हमारे हाथ मे कुछ नहीं रहता।"

द्रौपदी:
"तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदाई हूँ कृष्ण?"

कृष्ण: "नहीं द्रौपदी! तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो।
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी भी दूरदर्शिता रखती तो स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पातीं।"
द्रौपदी:
"मैं क्या कर सकती थी कृष्ण?"

कृष्ण: 
"जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती तो शायद परिणाम कुछ और होते।
इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी परिणाम कुछ और होते। 
और उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।
वह नहीं करती तो तुम्हारा चीर हरण नहीं होता तब भी शायद परिस्थितियां कुछ और होती।
और, हमें

अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत ज़रूरी होता है…
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…
जिसका
"ज़हर"
उसके
"दाँतों" में नहीं,
"शब्दों " में है…

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।
ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे,
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

 "शब्दों की शक्ति व आयु असीमित है।"

Bandana

सुसंगत से प्राप्त सद्गति

#सुसंगत से  प्राप्त सद्गति

एक भँवरे की मित्रता एक गोबरी ( गोबर में रहने वाले ) कीड़े से थी, एक दिन कीड़े ने भँवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे प्रिय मित्र हो इसलिए तुम आज मेरे पास भोजन के लिए आओ

भंवरा भोजन खाने पहुँचा !  खाने के बाद भंवरा सोच में पड़ गया- कि मैंने बुरे का संग किया इसलिए आज मुझे गोबर खाना पड़ा । अब भँवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया कि तुम कल मेरे यहाँ खाने पर आओ

अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा ! भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल पर बिठा दिया ! कीड़े ने परागरस पिया ! मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर मंदिर ले गया तथा बिहारी जी के चरणों में चढ़ा दिया ! कीड़े को ठाकुर जी के दर्शन हुए , चरणों में बैठने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ ! 
संध्या काल में पुजारी ने सारे फूल इकट्ठे किए और गंगा जी में छोड़ आए ! कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था ! इतने मे भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा- मित्र ! क्या हाल है ? 
कीड़े ने कहा- भाई ! जन्म जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी ! ये सब अच्छी संगत का फल है 
*संगत से गुण उपजे, संगत से गुण जाए*
*लोहा लगा जहाज़ में, पानी में उतराय*
कोई भी नहीं जानता कि.. हम इस जीवन के सफर में एक दूसरे से क्यों मिलते हैं 
सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु परमात्मा हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता है 
*हमें उन रिश्तों को हमेशा संजो कर रखना चाहिए*

*जय श्री कृष्णा* 🙏🏻

Bandana

मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं

🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता भटक गया..😃

तभी उसने देखा, एक शेर उसकी तरफ आ रहा है..

कुत्ते की सांस रूक गई और मन ही मन सोचने लगा:- आज तो काम तमाम मेरा..! 😎

ये विचार आते ही उसने एक फार्मूला अपनाया.....👍

उसने सामने कुछ सूखी हड्डियां पड़ी देखी.. 😃

वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसते हुए शेर को सुनाने के लिए जोर जोर से बोलने लगा:-

 वाह ! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है,एक और मिल जाए तो आज पूरी दावत हो जायेगी.....! 😃
और जोर से डकार मारी..

 शेर सोच में पड़ गया..😃
उसने सोचा.... 
ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है ! जान बचा कर भागने मे ही भलाई है !😃

और शेर वहां से जान बचा के भाग गया..😃

पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था.. 😂

उसने सोचा ये अच्छा मौका है.... शेर को सारी कहानी बता देता हूं ..😎

शेर से दोस्ती भी हो जायेगी,और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी टल जाएगा......😎 

वो फटाफट शेर के पीछे भागा..😃

कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि ये जरूर कुछ गड़बड़ करेगा......😎

उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी, कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है..😃

ये सुनकर शेर जोर से दहाड़ा -
चल मेरे साथ, अभी उसकी लीला ख़तम करता हूं..... 😎😎

और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर कुत्ते की तरफ चल दिया..😃

क्या आप बता सकते हैं कि कुत्ते ने दूसरा कौन सा फार्मूला अपनाया होगा❓🤔🤔

कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसके आगे जान का संकट आ गया... 😎

मगर फिर हिम्मत कर कुत्ता उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया और मैनेजमेंट का एक और फार्मूला अपनाया..... 😃

और जोर जोर से बोलने लगा:-

इस बन्दर को भेजे एक घंटा हो गया..साला अभी तक एक शेर को फंसा कर नहीं ला सका......!😃

यह सुनते ही शेर ने बंदर को वहीं पटका और वापस भाग गया.... 😃

*शिक्षा 1-* मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं👍

*शिक्षा 2-* हार्ड वर्क के बजाय स्मार्ट वर्क ही करें क्योंकि यहीं जीवन की असली सफलता मिलेगी 👍

*शिक्षा 3-* आपकी ऊर्जा, समय और ध्यान भटकाने वाले कई बन्दर आपके आस पास हैं, उन्हें पहचानिए और उनसे सावधान रहिए 😎

*व्यस्त रहिए, स्वस्थ रहिए*
😃😃😃

Bandana

स्नेह_के_आँसू

*ll #स्नेह_के_आँसू ll* 

गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल  की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। 

"दीदी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" 
सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। 

"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"

उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - 
"भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।"

"कैसी बात कर रही हैं दीदी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" 
सब्जीवाले ने कहा। 

"नहीं भैया!  उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं।  जब सब ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे,  तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी।  मैं किसी और से सब्जी  नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है,  अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" 
महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। 

"ओ बहन जी !  तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे।  अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? सब्जी वाले हैं, कोई नेता तो है नहीं कि वादा करके छोड़ दें।  रुके रहो दो मिनिट।" 

और सब्जी वाले ने एक थैली के अंदर टमाटर , आलू , प्याज , घीया , कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – 

"भैया !  तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो , कम से कम तोल तो लेते ,  और मुझे पैसे भी बता दो।  मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। 

"वाह..... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और बहिन ! मैं  कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ ।  ये सब तो यहीं से कमाया है,  इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी । बच्चों का खूब ख्याल रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।" 
और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। 

अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह *स्नेह के आंसुओं* से भरी हुईं थीं। 

*(नि:शब्द )*

Bandana

राम सुग्रीव मित्रता

💐राम सुग्रीव मित्रता 💐

मित्रता के मायने क्या है ? मित्रता के आदर्श क्या है ? पूरा संसार यह गुह्यविज्ञान तो प्रभुपाद श्रीराम से सीखे ! वीरवर हनुमान अपने गुप्तचर / दौत्य कर्म का समुचित निर्वहन कर सम्यक समाधान पश्चात सौमित्र सहित प्रभु श्रीराम को ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित सुग्रीव की सुरक्षित गुफा में ले आते है ! सामान्य शिष्टाचारी वार्तालाप पश्चात सीधे आगमन प्रयोजन पर संवाद होता है ! सुग्रीव प्रभुपाद से राजनैतिक संधि की आकांक्षा रखते है और तदनुसार ही प्रस्ताव रखते है ! प्रभुपाद उसे अस्वीकार कर मैत्री की बात करते है ! हनुमत काष्ठ पलकों को घिसकर अग्न्याधान कर मैत्री के रिश्ते को अग्निसाक्षी बनाते है ! प्रभुपाद सभी को मैत्री का मूल्य समझाते है ! तो अगर आप नही जानते है तो सुने ----
             "मैत्री में किसी वस्तु या सामान या संसाधन का आदान प्रदान नहीं होता बल्कि संसाधन का सामूहिक अधिकारपूर्वक उपयोग होता हूं! उपकार के उत्तर स्वरूप किसी प्रति उपकार की आशा नही की जाती ! मैत्री किसी वणिक का सौदा नहीं है जो मुद्रा के बदले वस्तु दे ! मैत्री में कोई पक्ष बड़ा या छोटा नहीं होता बल्कि बराबर होता है ! मैत्री में लिंग,रक्त,वंश,आयु और प्रतिष्ठा के मापदंड लागू नहीं होते ! किसी भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह या राष्ट्र की किसी अन्य से मैत्री हो सकती है ! मैत्री में उपकार के बदले उपकार किया भी जा सकता है और नहीं भी ! प्रति उपकार हालात पर निर्भर होता है ! मैत्री का आधार स्वार्थ नहीं बल्कि प्रेम ,सद्भाव और समर्पण होता है ! मैत्री में प्यार/ प्रेम का विनिमय ही स्वीकृत है ! किसी अन्य का नहीं! मैत्री की आँखे सदैव बंद और हृदय सदैव खुला रहता है ! मैत्री मित्र को मन की आखों से ही देखती है ! मित्र का दुख खुद का दुख और मित्र का सुख खुद का सुख ! पृथक पृथक दैहिक शरीरों की एकात्म अनुभूति ही मैत्री है !  " 

प्रभुपाद राम केवल स्वार्थयुक्त राजनैतिक संधि ही चाहते तो परम सामर्थ्यवान महाराज बालि से करते न कि राज्य बहिष्कृत सुग्रीव से ! लेकिन प्रभुपाद राम संसार को मैत्री के असल प्रतिमान का पाठ पढ़ाते है ! श्रीराम प्रेम और मैत्री के भूखे है ! श्रीराम मन,वचन और कर्म से स्वच्छ और पवित्र है और उनका छल ,कपट और छिद्र से मुक्त है ! 

         भारत के सर्वोच्च आराध्य प्रभुपाद के पदचिन्हों पर चलने के लिए किसी उपदेश की आवश्यकता न होनी चाहिए क्योंकि स्वयं प्रभुपाद ने संसार को कोई उपदेश न दिया ! उनके द्वारा  समय समय पर किया कार्य व्यवहार और आचरण ही श्रेष्ठ और अनुकरणीय है और वही धर्म है ! सब चले धर्म के मार्ग पर ! जो सत्य में सत्य और सनातन है !

ताराचंद खेतावत
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Bandana

पक्षीराज गरुण और कागभुशुण्डि जी संवाद

*पक्षीराज गरुण और कागभुशुण्डि जी संवाद*

पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान कर कहिए॥

हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है, फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है।सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥

संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान्‌ पुण्य कौन सा है और सबसे महान्‌ भयंकर पाप कौन है॥

फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है।

*काकभुशुण्डिजी ने कहा-* 
हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥

ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥

जगत्‌ में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत्‌ में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥

संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥

किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। 

हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥
वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। 

दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥

और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥

शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥

जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥

जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। 

हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥

यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)॥

ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥

अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥

मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥
एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे?॥

नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥

इस प्रकार जगत्‌ में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुःखी हो रहे हैं। मैंने ये थो़ड़े से मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परंतु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही॥

प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिए जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परंतु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषय रूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥

*यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥*

*जय सियाराम जय जय हनुमान* 

🙏

Bandana

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

Soundproof hammer! Be positive India Keep thinking positive

Name: Prithwish Dutta, Class 12, Don Bosco High & Technical School
Location: Howrah, West Bengal
An idea of a soundproof hammer, which would not make any sound when struck against any object. The impact energy would be absorbed in the hammer itself, which will be covered with a foam like substance.
Enjoy it!

मंगलवार, 8 मार्च 2016

Portable latch for restrooms.... What and IDIA ..... Keep it up Be positive


Name: PS Senthur Balaji, Class 12, Maharishi International Residential School, Kanchipuram
Location: Erode, Tamil Nadu
An idea of a latch useful for people travelling frequently or in rural areas, which can be used for locking a door temporarily. This can be used in public restrooms or other places that lack latches.

Body suit for Divyang..... Great innovation ... Keep India thinking positive


Name: Ayush Gupta and Arnov Sharma, Class 12, Delhi Public School
Location: Haridwar, Uttrakhand
An mechanical exoskeleton or suit, which can support a physically disabled person, and aid orthopedic patients.