बुधवार, 23 जून 2021

कठिन कार्य और दक्ष कार्य*

*कठिन कार्य और दक्ष कार्य*

मुकेश और अनिल, विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त होने के कुछ महीने बाद एक साथ एक ही कंपनी में काम करने लगे।

कुछ वर्षों के काम के बाद, उनके मैनेजर ने मुकेश को वरिष्ठ बिक्री मैनेजर के पद पर पदोन्नत [promotion] कर दिया, लेकिन अनिल अभी भी अपने प्रवेश स्तर, जूनियर बिक्री अधिकारी, के पद पर ही था। अनिल के मन में ईर्ष्या और असंतोष की भावना घर कर गई, लेकिन फिर भी उसने काम करना जारी रखा।

एक दिन अनिल को हीन भावना में लगने लगा कि अब वह मुकेश के साथ काम नहीं कर पायेगा। उसने अपना त्याग पत्र लिख दिया, लेकिन मैनेजर को सौंपने से पहले, उसने मैनेजर से शिकायत करी की वह, कड़ी मेहनत करने वाले कर्मचारियों को महत्व नहीं देते है, और पक्षपात करके लोगों को पदोन्नत कर देते है!

मैनेजर जानता था कि अनिल ने कंपनी में जितने साल बिताए थे, उन सालों में उसने बहुत मेहनत की है;  मुकेश से भी कठिन कार्य किया था और इसलिए वह पदोन्नति का पात्र तो था। अनिल को इस बात का एहसास कराने के लिए मैनेजर ने अनिल को एक कार्य सौंप दिया।

"जाओ और पता करो कि क्या कोई शहर में तरबूज बेच रहा है ?"

अनिल वापस आया और बोला, "हाँ! बेच रहा है।"

मैनेजर ने पूछा, " उन तरबूज की क्या कीमत है?"  अनिल पूछने के लिए शहर वापस चला गया और फिर मैनेजर को सूचित करने के लिए लौट आया;  "वे तरबूज 13.50 रूपये प्रति किलो कीमत के हैं।"

मैनेजर ने अनिल से कहा, "मैं मुकेश को यही काम दूँगा जो मैंने तुम्हें दिया था। कृपया उसकी प्रतिक्रिया पर ध्यान देंना। "

मैनेजर ने अनिल की मौजूदगी में मुकेश से कहा; "जाओ और पता करो कि क्या कोई शहर में तरबूज बेच रहा है?"

मुकेश पता लगाने गया और वापस लौटने पर उसने कहा:- "मैनेजर, पूरे शहर में तरबूज बेचने वाला केवल एक व्यक्ति है। प्रत्येक तरबूज की कीमत 49.00 रुपये है और आधा तरबूज के लिए 32.50 रुपये है। तरबूज की फांके काटकर वह उन्हें 13.50 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बेचता है। उसके पास अभी  93 तरबूज हैं, प्रत्येक का वजन लगभग 7kg है। इसके अलावा उसके पास एक खेत है और अगले 4 महीनों के लिए वो हमें 102 तरबूज प्रति दिन 27.00 रूपये प्रति तरबूज की दर से उपलब्ध कर सकता है जिसमें तरबूज के परिवहन {transportation] की कीमत भी शामिल हैं।

तरबूज अच्छी गुणवत्ता {quality} के साथ ताजा और लाल हैं और पिछले साल हमने जो खरबूजे बेचे थे, ये उनसे  स्वाद में यह बेहतर हैं। उसके पास अपनी तरबूज काटने की मशीन भी है और वह हमारे लिए मुफ्त में तरबूज की फांके करने को तैयार है।

हमें कल सुबह 10 बजे से पहले उसके साथ एक सौदा करने की जरूरत है और हम इस सौदे से पिछले साल के मुनाफे से 223000.00 रूपये ज्यादा कमा लेंगे। यह हमारे व्यापार के कुल प्रदर्शन [परफॉर्मेंस] में सकारात्मक योगदान देगा क्योंकि यह हमारे वर्तमान कुल बिक्री लक्ष्य में न्यूनतम 3.78% की वृद्धि करेगा।

मैंने इस जानकारी को लिखित रूप में प्रस्तुतिकरण [presentation] के रूप में तैयार कर दिया है। कृपया मुझे बताएं कि क्या आपको इसकी आवश्यकता है?  मैं इसे आपको पंद्रह मिनट में भेज सकता हूँ ।"

अनिल बहुत प्रभावित हुआ और उसे अपने और मुकेश के बीच अंतर का एहसास हो गया। उसने इस्तीफा नहीं देने का फैसला किया और मुकेश से सीखने का फैसला किया।

आइए इस कहानी से हम अपने सभी प्रयासों में एक अतिरिक्त  कदम आगे जाने के महत्व को जानें। आप अपने काम में पूरी क्षमता तभी दे सकते हैं जब आपका दिल उस काम से जुड़ा हो।

आपको वह काम करने के लिए इनाम नहीं  मिलता जो आपकी नौकरी का हिस्सा है। उसके लिए आपको केवल वेतन मिलता है।

आपको अतिरिक्त  प्रयास {extra efforts} और अपेक्षाओं से परे प्रदर्शन करने के लिए पुरस्कृत किया जाता है। दिल से काम करने के लिए काम में लगाव,प्यार व रुचि होनी जरूरी है। दिल से किये गए एक छोटे से प्रयास से सारा परिणाम बदल सकता है।

Bandana

शुक्रवार, 18 जून 2021

बेटा

*🌷 बेटा 🌷*

"माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।" तक़रीबन 32 साल के अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।

*"बेटा! तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या?" माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी।*

"माँ! मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।" सुदीप ने कहा।
"जैसी तेरी इच्छा!" मरी से आवाज़  में माँ बोली और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ 'प्रभा देवी' को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में!

वृद्धाश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर ज़िन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धाश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।
              
एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं। उनमें से एक ने कहा, "डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।"

वहाँ बैठी एक महिला बोली, "प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी तब सुदीप कुल चार साल का था। पति की मौत के बाद प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये। किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।"

वृद्धाश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया और कहा, "सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो?"

"माँ! अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ" सुदीप का जवाब था।
             
तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, "मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा!"

इस प्रकार तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धाश्रम के लोग भी कहने लगे कि, देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया!

आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, "मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"

किसी और बुजुर्ग ने कहा, "मगर वो तो शादीशुदा भी नहीं था।"

"अरे होगी उसकी कोई 'गर्ल-फ्रेण्ड' जिसने कहा होगा पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।"

दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।
             
दो साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, "इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो। हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।"

"इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ? उसे मरे तो तीन साल हो गये।" 

शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये।

उनमें से एक बोला, "अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था?"

 "वो मोबाईल तो मेरे पास है जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।" शर्मा जी बोले।

"पर ऐसा क्यों ?" किसी ने पूछा।

शर्मा जी बोले कि, करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, "शर्मा जी! मुझे 'ब्लड कैंसर' हो गया है और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी। मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी। वो तो जीते जी ही मर जायेगी। *मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे।* मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा 'फ्लेट' और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।"

यह दास्ताँ सुन वहाँ पर उपस्थित लोगों की आँखें झलझला आयीं।

प्रभा देवी का अन्तिम संस्कार आश्रम के ही एक हिस्से में कर दिया गया। उनके अन्तिम संस्कार में शर्मा जी ने आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के परिवार वालों को भी बुलाया। 

माँ-बेटे की अनमोल और अटूट प्यार की दास्ताँ का ही असर था !

इस कहानी को पढ़ते हुए आप के मन के विचार कितनी बार बदले जरा सोचिये।

*हरबार जैसा हम सोचते है, जो तर्क करते है, जरूरी नहीb की वास्तविकता वही हो।*

Bandana

गुरुवार, 17 जून 2021

इंसानियत अभी जिंदा है

*💐इंसानियत अभी जिंदा है💐*

एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला~ ''साहब! बूट पॉलिश ?''

उसकी दयनीय सूरत देखकर उन्होंने अपने जूते आगे बढ़ा दिये, बोले- ''लो, पर ठीक से चमकाना।''

लड़के ने काम तो शुरू किया परंतु अन्य पॉलिशवालों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी।

वे बोले~ ''कैसे ढीले-ढीले काम करते हो? जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ !'' 

वह लड़का मौन रहा। 

इतने में दूसरा लड़का आया। उसने इस लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट काम में जुट गया। पहले वाला गूँगे की तरह एक ओर खड़ा रहा। दूसरे ने जूते चमका दिये।

'पैसे किसे देने हैं?' इस पर विचार करते हुए उन्होंने जेब में हाथ डाला। उन्हें लगा कि 'अब इन दोनों में पैसों के लिए झगड़ा या मारपीट होगी।' फिर उन्होंने सोचा, 'जिसने काम किया, उसे ही दाम मिलना चाहिए।' इसलिए उन्होंने बाद में आनेवाले लड़के को पैसे दे दिये।

उसने पैसे ले तो लिये परंतु पहले वाले लड़के की हथेली पर रख दिये। प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया।

वह आदमी विस्मित नेत्रों से देखता रहा। उसने लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा~  ''यह क्या चक्कर है?''

लड़का बोला~ ''साहब! यह तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं। ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया नहीं तो इसकी वृद्धा माँ और बहनों का क्या होता,बहुत स्वाभिमानी है... भीख नहीं मांग सकता....!''

फिर थोड़ा रुककर वह बोला ~ ''साहब! यहाँ जूते पॉलिश करनेवालों का हमारा समूह है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं जिन्हें सब 'सत्संगी चाचाजी' कहकर पुकारते हैं। वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी सत्संग की बातें बताते रहते हैं। उन्होंने ही ये सुझाव रखा कि 'साथियो! अब यह पहले की तरह स्फूर्ति से काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ???

ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना, स्नेह, सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकट करने का एक अवसर दिया है।जैसे पीठ, पेट, चेहरा, हाथ, पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही शरीर के अंग, ऐसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी हैं एक ही आत्मा! हम सब एक हैं।

स्टेशन पर रहने वाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी करेंगे।''

जूते पॉलिश करनेवालों के दल में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊँचाई देखकर वे सज्जन चकित रह गये औऱ खुशी से उसकी पीठ थपथपाई...औऱ सोचने लगे शायद इंसानियत अभी तक जिंदा है.....!!

Bandana

बुधवार, 16 जून 2021

गुस्से को शान्त करने का एक सुंदर उदाहरण

एक सुन्दर पोस्ट जो कहीं से प्राप्त हुई, 
ज्यों की त्यों प्रेषित है...

गुस्से को शान्त करने का एक सुंदर उदाहरण-

एक वकील का सुनाया हुआ 
एक हृदयस्पर्शी किस्सा -

"मै अपने चेंबर में बैठा हुआ था, 
एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा।
उसके हाथ में कागज़ो का बंडल, 
धूप में काला हुआ चेहरा, 
बढ़ी हुई दाढ़ी, सफेद कपड़े जिनके पांयचों के पास मिट्टी लगी थी।"

उसने कहा - "उसके पूरे फ्लैट पर स्टे लगाना है, बताइए, क्या क्या कागज और चाहिए... 
क्या लगेगा खर्चा... "

मैंने उन्हें बैठने का कहा - 

"रघु, पानी दे इधर" मैंने आवाज़ लगाई!

वो कुर्सी पर बैठे!

उनके सारे कागजात मैंने देखे, 
उनसे सारी जानकारी ली, 
आधा पौना घंटा गुजर गया।

"मै इन कागज़ो को देख लेता हूँ ,
फिर आपकी केस पर विचार करेंगे। 
आप ऐसा कीजिए, 
अगले शनिवार को मिलिए मुझसे।" 

चार दिन बाद वो फिर से आए- !
वैसे ही कपड़े
बहुत डेस्परेट लग रहे थे

अपने छोटे भाई पर गुस्सा थे बहुत!
 
मैंने उन्हें बैठने का कहा,

वो बैठे!

ऑफिस में अजीब सी खामोशी गूंज रही थी।

मैंने बात की शुरुआत की ! -
"बाबा, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए।
और आपके परिवार के बारे में और आपकी निजी जिंदगी के बारे में भी मैंने 
बहुत जानकारी हासिल की।
मेरी जानकारी के अनुसार:
आप दो भाई है, एक बहन है,
आपके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए।
बाबा आप नौवीं पास है 
और आपका छोटा भाई इंजिनियर है।
आपने  छोटे भाई की पढ़ाई के लिए आपने स्कूल छोड़ा, लोगो के खेतों में दिहाड़ी पर काम किया,
 कभी अंग भर कपड़ा और पेट भर खाना आपको नहीं मिला फिर भी भाई के पढ़ाई के लिए पैसों की कमी आपने नहीं होने दी।

एक बार खेलते खेलते भाई पर किसी बैल ने सींग घुसा दिए तब भाई लहूलुहान हो गया।
फिर आपने उसे कंधे पर उठा कर 5 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल लेे गए। 
सही देखा जाए तो आपकी उम्र भी नहीं थी 
ये समझने की, 
पर भाई में जान बसी थी आपकी।
माँ बाप के बाद मै ही इन का माँ-बाप… 
ये भावना थी आपके मन में।

फिर आपका भाई इंजीनियरिंग में 
अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले पाया 
और आपका दिल खुशी से भरा हुआ था।
फिर आपने जी तोड़ मेहनत की।
 80,000 की सालाना फीस भरने के लिए आपने रात दिन एक कर दिया यानि बीवी के गहने गिरवी रख के, कभी साहूकार कार से पैसा ले कर आपने उसकी हर जरूरत पूरी की।
फिर अचानक उसे किडनी की तकलीफ शुरू हो गई, डॉक्टर ने किडनी निकालने का कहा 
और
तुम ने अगले मिनट में अपनी किडनी उसे दे दी यह कह कर कि कल तुझे अफसर बनना है,
नौकरी करनी है, 
कहाँ कहाँ घूमेगा बीमार शरीर लेे के। 
मुझे गाँव में ही रहना है, 
ये कह कर किडनी दे दी उसे।

फिर भाई मास्टर्स के लिए हॉस्टल पर रहने गया।लड्डू बने, देने जाओ, खेत में मकई खाने तैयार हुई, भाई को देने जाओ, 
कोई तीज त्योहार हो, भाई के कपड़े बनाओ।
घर से हॉस्टल 25 किलोमीटर तुम उसे डिब्बा देने साइकिल पर गए।
हाथ का निवाला पहले भाई को खिलाया तुमने।
फिर वो मास्टर्स पास हुआ, 
तुमने गाँव को खाना खिलाया।
फिर उसने उसी के कॉलेज की लड़की जो दिखने में एकदम सुंदर थी से शादी कर ली ,
तुम सिर्फ समय पर ही वहाँ गए।
भाई को नौकरी लगी, 
3 साल पहले उसकी शादी हुई, 
अब तुम्हारा बोझ हल्का होने वाला था।
पर किसी की नज़र लग गई 
आपके इस प्यार को।
शादी के बाद भाई ने आना बंद कर दिया। 
पूछा तो कहता है मैंने बीवी को वचन दिया है।
घर पैसा देता नहीं, 
पूछा तो कहता है कर्ज़ा सिर पे है।
पिछले साल शहर में फ्लैट खरीदा।
पैसे कहाँ से आए पूछा तो कहता है 
कर्ज लिया है।
मैंने मना किया तो कहता है भाई, 
तुझे कुछ नहीं मालूम, 
तू निरा गवार ही रह गया।
अब तुम्हारा भाई चाहता है 
गाँंव की आधी खेती बेच कर उसे पैसा दे दे।
इतना कह के मैं रुका - रघु की लाई चाय की प्याली मैंने मुँह से लगाई -!
"तुम चाहते हो भाई ने जो मांगा 
वो उसे ना दे कर उसके ही फ्लैट पर 
स्टे लगाया जाए - क्यों यही चाहते हो तुम..." 

वो तुरंत बोला, "हां"

मैंने कहा - हम स्टे लेे सकते है, 
भाई के प्रॉपर्टी में हिस्सा भी माँग सकते हैं

                            पर….

1) तुमने उसके लिए जो खून पसीना एक किया है वो नहीं मिलेगा!

2) तुम्हारीे दी हुई किडनी वापस नहीं मिलेगी!

3) तुमने उसके लिए जो ज़िन्दगी खर्च की है 
वो भी वापस नहीं मिलेगी।

मुझे लगता है इन सब चीजों के सामने 
उस फ्लैट की कीमत शून्य है।
 
तुम्हारे भाई की नीयत फिर गई, 
वो अपने रास्ते चला गया ;
अब तुम भी उसी कृतघ्न सड़क पर मत जाओ।

वो भिखारी निकला,

तुम दिलदार थे।

दिलदार ही रहो …..

तुम्हारा हाथ ऊपर था,

ऊपर ही रखो।

कोर्ट कचहरी करने की बजाय 
बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ।
पढ़ाई कर के तुम्हारा भाई बिगड़ गया ,
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि 
तुम्हारे बच्चे भी ऐसा करेंगे..."

वो मेरे मुँह को ताकने लगा।

उठ के खड़ा हुआ, सब काग़ज़ात उठाए 
और आँखे पोछते हुए बोला - 
"चलता हूँ, वकील साहब।" 

उसकी रूलाई फुट रही थी और वो 
मुझे  दिख ना जाए ऐसी कोशिश कर रहा था।

इस बात को अरसा गुजर गया!
                    
कल वो अचानक मेरे ऑफिस में आया।
कलमों में सफेदी झाँक रही थी उसके। 
साथ में एक नौजवान था और हाथ में थैली।

मैंने कहा- "बाबा, बैठो"

उसने कहा, "बैठने नहीं आया वकील साहब, मिठाई खिलाने आया हूँ । 
ये मेरा बेटा, बैंक मैनेजर है !
बैंगलोर रहता है, कल आया गाँव।
अब तीन मंजिला मकान बना लिया है वहाँ।
थोड़ी थोड़ी कर के 10–12 एकड़ खेती की जमीन खरीद ली अब।"

मै उसके चेहरे से टपकते हुए खुशी को 
महसूस कर रहा था
"वकील साहब, आपने मुझे कहा था-  
कोर्ट कचहरी के चक्कर में मत पड़ो !"
आपने बहुत नेक सलाह दी 
और मुझे उलझन से बचा लिया।
जबकि गाँव में सब लोग मुझे 
भाई के खिलाफ उकसा रहे थे।
मैंने उनकी नहीं, आपकी बात सुन ली 
और मैंने अपने बच्चो को लाइन से लगाया और भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद नहीं होने दी।
कल भाई और उनकी पत्नी भी घर आए थे।
 पाँव छू छूकर माफी मांगने लगे।
मैंने अपने भाई को गले से लगा लिया।
और मेरी धर्मपत्नी ने उसकी धर्मपत्नी को 
गले से लगा लिया।
हमारे पूरे परिवार ने बहुत दिनों बाद 
एक साथ भोजन किया।
बस फिर क्या था आनंद की लहर 
घर में दौड़ने लगी।

मेरे हाथ का पेडा हाथ में ही रह गया
 
मेरे आंसू टपक ही गए आखिर. .. .

गुस्से को योग्य दिशा में मोड़ा जाए 
तो पछताने की जरूरत नहीं पड़े कभी

बहुत ही अच्छा है इस को समझना 
और अमल में लाना चाहिए।
यह एक सच्ची घटना है 
शिक्षाप्रद है और बेमिसाल भी है!

Bandana

सोमवार, 14 जून 2021

मिडिल-क्लास

लिखने वाले ने बहुत ही गज़ब का लिखा है। बहुत  बारीकी से observations किये हैं

👌👌👌👌👌
       "मिडिल-क्लास"  का होना भी
        किसी वरदान से कम नहीं है.
          कभी बोरियत नहीं होती.

      जिंदगी भर कुछ ना कुछ आफत
           लगी ही रहती है.

    मिडिल क्लास वालों की स्थिति 
        सबसे दयनीय होती है,

न इन्हें तैमूर जैसा बचपन नसीब होता है 
  न अनूप जलोटा जैसा बुढ़ापा, फिर भी 
         अपने आप में उलझते हुए
                व्यस्त रहते हैं.
       मिडिल क्लास होने का भी 
           अपना फायदा है.
  चाहे BMW का भाव बढ़े या AUDI का 
  या फिर नया i phone लाँच हो जाये,
         कोई फर्क नहीं पड़ता.
        मिडिल क्लास लोगों की 
   आधी जिंदगी तो ... झड़ते हुए बाल
     और बढ़ते हुए पेट को रोकने में ही 
                  चली जाती है.

इन घरों में पनीर की सब्जी तभी बनती है,
  जब दूध गलती से फट जाता है, और 
 मिक्स-वेज की सब्ज़ी भी तभी बनती हैं 
   जब रात वाली सब्जी बच जाती है.

      इनके यहाँ फ्रूटी, कोल्ड ड्रिंक 
 एक साथ तभी आते हैं , जब घर में कोई 
   बढ़िया वाला रिश्तेदार आ रहा होता है.
       मिडिल क्लास वालों के यहाँ
            कपड़ों की तरह ही 
        खाने वाले चावल की भी 
          तीन वेराईटी होती है ~
    डेली, कैजुवल और पार्टी वाला.

   छानते समय चायपत्ती को दबा कर
     लास्ट बून्द तक निचोड़ लेना ही 
     मिडिल क्लास वालों के लिए
    परमसुख की अनुभुति होती है.

    ये लोग रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल 
             नहीं करते, सीधे 
         अगरबत्ती जला लेते हैं.
   मिडिल क्लास भारतीय परिवार के
     घरों में  Get together नहीं होता,
      यहाँ 'सत्यनारायण भगवान की'
               कथा होती है.

      इनका फैमिली बजट इतना
   सटीक होता है, कि सैलरी अगर 
    31 के बजाय 1 को आये, तो 
      गुल्लक फोड़ना पड़ जाता है.
         मिडिल क्लास लोगों की 
            आधी ज़िन्दगी तो 
       "बहुत महँगा है"  बोलने में ही 
               निकल जाती है.

        इनकी "भूख" भी ... 
   होटल के रेट्स पर डिपेंड करती है. 
                दरअसल ....
      महंगे होटलों की मेन्यू-बुक में 
           मिडिल क्लास इंसान
       'फूड-आइटम्स' नहीं बल्कि 
    अपनी "औकात" ढूंढ रहा होता है.
             इश्क-मोहब्बत तो 
           अमीरों के चोंचले हैं.
      मिडिल क्लास वाले तो सीधे 
             "ब्याह" करते हैं.

          इनके जीवन में कोई
          वैलेंटाइन नहीं होता.
       "जिम्मेदारियाँ"  जिंदगी भर
   बजरंग-दल सी ... पीछे लगी रहती हैं.

     मध्यम वर्गीय दूल्हा-दुल्हन भी 
   मंच पर ऐसे बैठे रहते हैं मानो जैसे 
         किसी भारी सदमे में हों.

          अमीर शादी के बाद
      हनीमून पर चले जाते हैं , और 
  मिडिल क्लास लोगों की शादी के बाद 
           टेन्ट बर्तन वाले ही
        इनके पीछे पड़ जाते हैं.

         मिडिल क्लास बंदे को 
       पर्सनल बेड और रूम भी 
  शादी के बाद ही अलाॅट हो पाता है.
 मिडिल क्लास ... बस ये समझ लो कि 
   जो तेल सर पे लगाते हैं , वही तेल
        मुँह पर भी रगड़ लेते हैं.

    एक सच्चा मिडिल क्लास आदमी
              गीजर बंद करके 
       तब तक नहाता रहता है 
         जब तक कि नल से 
   ठंडा पानी आना शुरू ना हो जाए.

  रूम ठंडा होते ही AC बंद करने वाला
 मिडिल क्लास आदमी चंदा देने के वक्त 
       नास्तिक हो जाता है, और 
    प्रसाद खाने के वक्त आस्तिक.
      दरअसल मिडिल-क्लास तो 
   चौराहे पर लगी घण्टी के समान है, 
     जिसे लूली-लगंड़ी, अंधी-बहरी, 
           अल्पमत-पूर्णमत 
        हर प्रकार की सरकार 
        पूरा दम से बजाती है.
 मिडिल क्लास को आज तक बजट में 
     वही मिला है, जो अक्सर हम
     🔔  मंदिर में बजाते हैं. 🔔

        फिर भी हिम्मत करके 
          मिडिल क्लास आदमी 
             पैसा बचाने की
       बहुत कोशिश करता है,
                 लेकिन 
      बचा कुछ भी नहीं पाता.
   हकीकत में मिडिल मैन की हालत 
         पंगत के बीच बैठे हुए
     उस आदमी की तरह होती है 
       जिसके पास पूड़ी-सब्जी 
   चाहे इधर से आये, चाहे उधर से
         उस तक आते-आते 
           खत्म हो जाती है.
      मिडिल क्लास के सपने भी
             लिमिटेड होते हैं.
 "टंकी भर गई है, मोटर बंद करना है"
      गैस पर दूध उबल गया है,
        चावल जल गया है,
    इसी टाईप के सपने आते हैं.

     दिल में अनगिनत सपने लिए 
         बस चलता ही जा ता है ...
                 चलता ही जाता है.

Bandana

सच्चा मंत्र

*सच्चा मंत्र*

एक गरीब औरत एक साधु के पास गई,"स्वामी जी! कोई ऐसा पवित्र मन्त्र लिख दीजिये जिससे मेरे बच्चों का रात को भूख से रोना बन्द हो जाये...।" 

साधु ने कुछ पल एकटक आकाश की ओर देखा फिर अपनी कुटिया में अन्दर गया और एक पीले कपड़े पर एक मन्त्र लिखकर उसे ताबीज की तरह लपेट-बाँधकर उस महिला को दे दिया।

साधु ने कहा, "इस मन्त्र को घर में उस जगह रखना, जहाँ नेक कमाई का धन रखती हो।" महिला खुश होकर चली गई।

ईश्वर कृपा से उस उसके पति की आमदनी ठीक हुई और बच्चों को भोजन मिल गया। रात शान्ति से कट गई। अगले रोज़ भोर में ही उन्हें पैसों से भरी एक थैली घर के आंगन में मिली। थैली में धन के अलावा एक पर्चा भी निकला, जिस पर लिखा था, कोई कारोबार कर लें...।

इस बात पर अमल करते हुवे उस औरत के पति ने एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली और काम शुरू किया। धीरे धीरे कारोबार बढ़ा, तो दुकानें भी बढ़ती गईं...। जैसे पैसों की बारिश सी होने लगी...।

पति की कमाई तिजोरी में रखते समय एक दिन उस महिला की नज़र उस मन्त्र लिखे कपड़े पर पड़ी...। "न जाने, साधु महाराज ने ऐसा कौन सा मन्त्र लिखा था कि हमारी सारी गरीबी दूर हो गई?" सोचते सोचते उसने वह मन्त्र वाला कपड़ा खोल डाला...।

लिखा था कि:
*जब पैसों की तंगी ख़त्म हो जाये, तो सारा पैसा तिजोरी में छिपाने की बजाय कुछ पैसे ऐसे घर में डाल देना जहाँ से रात को बच्चों के रोने की आवाज़ें आती हों..!!*

स्वस्थ रहें! सुरक्षित रहें! खुश रहें! व्यस्त रहें!

Bandana

शनिवार, 12 जून 2021

आपका औहदा क्या था या क्या है, यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए🙏🙏

*पराजय*
    जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद जब ज्वाइन किया..तो जानकारी हुई की ये जिला ..स्कूली शिक्षा के लिहाज से बहुत पिछड़ा हुआ हैं...वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कहा आप ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान दें..
    बस तय कर लिया..महीने में आठ दस दिन जरूर ग्रामीण स्कूलों को दूंगा..
        शीघ्र ही..ग्रामीण इलाकों में दौरों का सिलसिला चल निकला..पहाड़ी व जंगली इलाका भी था कुछ..
    एक दिन मातहत कर्मचारियों से मालूम हुआ..
  "बड़ेरी " नामक गांव, जो एक पहाड़ी पर स्थित है..वहां के स्कूल में कोई शिक्षा अधिकारी नहीं जाता था क्योंकि वहां पहुंचने के लिए.. वाहन छोड़कर..लगभग दो तीन किलोमीटर जंगली रास्ते से पैदल ही जाना होता था ..
       तय कर लिया अगले दिन वहां जाया जाए..
वहां कोई ,मिस्टर  पी. के. व्यास हेड मास्टर थे.. जो बरसों से, पता नहीं क्यूं.. वहीं जमे हुए थे..! मैंने निर्देश दिए उन्हें कोई अग्रिम सूचना न दी जाय..सरप्राइज विजिट होगी..!
   अगले दिन हम सुबह निकले.. दोपहर बारह बजे..ड्राइवर ने कहा साहब यहां से आगे..पहाड़ी पर पैदल ही जाना होगा दो तीन किलोमीटर..
      मै और दो अन्य कर्मचारी पैदल ही चल पड़े..
लगभग डेढ़ घंटे सकरे..पथरीले जंगली रास्ते से होकर हम ऊपर गांव तक पहुंचे..सामने स्कूल का पक्का भवन था..और लगभग दो  सौ कच्चे पक्के मकान थे..
    स्कूल साफ सुथरा और व्यवस्थित रंगा पुता हुआ था..बस तीन कमरे और प्रशस्त बरामदा..चारों तरफ सुरम्य हरा भरा वन..
      अंदर क्लास रूम में पहुंचे तो तीन कक्षाओं में लगभग सवा सौ बच्चे तल्लीनता पूर्वक पढ़ रहे थे.. हालांकि शिक्षक कोई भी नहीं था..एक बुजुर्ग सज्जन बरामदे में थे जो वहां नियुक्त चपरासी थे.शायद...
     उन्होंने बताया हेड मास्टर साहब आते ही होंगे..
 हम बरामदे में बैठ गए थे..तभी देखा एक चालीस बयालीस वर्ष के सज्जन..अपने दोनो हाथो में पानी की बाल्टियां लिए ऊपर चले आ रहे थे..पायजामा घुटनों तक चढ़ाया हुआ था..ऊपर खादी का कुर्ता जैसा था..!
      उन्होंने आते ही परिचय दिया.. मैं प्रशांत व्यास यहां हेड मास्टर हूं..। यहां इन दिनों ..बच्चों के लिए पानी, थोड़ा नीचे जाकर कुंए से लाना होता है..हमारे चपरासी दादा..बुजुर्ग हैं अब उनसे नहीं होता..इसलिए मै ही लेे आता हूं..वर्जिश भी हो जाती है..वे मुस्कुराकर बोले..
   उनका चेहरा पहचाना सा लगा और नाम भी..
मैंने उनकी और देखकर पूछा..तुम प्रशांत व्यास हो..इंदौर से.. गुजराती कॉलेज..!
      मैंने हेट उतार दिया था.. उसने कुछ पहचानते हुए .. चहकते हुए कहा..आप अभिनव.. हैं, अभिनव श्रीवास्तव..! मैंने कहा और नहीं तो क्या.. भई..!
       लगभग बीस बाईस बरस पहले हम इंदौर में साथ ही पढ़े थे..बेहद होशियार और पढ़ाकू था  वो..बहुत कोशिश करने के बावजूद शायद ही कभी उससे ज्यादा नंबर आए हों.. मेरे..!
         एक प्रतिस्पर्धा रहती थी हमारे बीच..जिसमें हमेशा वही जीता करता था..
      आज वो हेड मास्टर था और मैं..जिला शिक्षा अधिकारी.. पहली बार उससे आगे निकलने.. जीतने.. का भाव था.. और सच कहूं तो खुशी थी मन में..
       मैंने सहज होते हुए पूछा.. यहां कैसे पहुंचे.. भई..?. और कौन कौन है घर पर..? 
             उसने विस्तार से बताना शुरू किया..
  " एम. कॉम करते समय ही बाबूजी की मालवा मिल वाली नौकरी जाती रही थी..फिर उन्हें दमे की बीमारी भी तो थी..! ..घर चलाना मुश्किल हो गया था..किसी तरह पढ़ाई पूरी की.. नम्बर अच्छे  थे.. इसलिए संविदा शिक्षक की नियुक्ति मिल गई थी..जो छोड़ नहीं सकता था..आगे पढ़ने की न गुंजाइश थी न स्थितियां..इस गांव में पोस्टिंग मिल गई..मां बाबूजी को  लेकर यहां चला आया..सोचा गांव में कम पैसों में गुजारा हो ही जायेगा..!"
       फिर उसने हंसते हुए कहा.. "इस दुर्गम गांव में पोस्टिंग..और वृद्ध.. बीमार मां बाप को देख..कोई लड़की वाले लड़की देने तैयार नहीं हुए..इसलिए विवाह नहीं हुआ..और ठीक भी है.. कोई पढ़ी लिखी लड़की  भला यहां क्या करती..! 
         अपनी कोई पहुंच या पकड़ भी नहीं थी कि यहां से ट्रांसफर करा पाते..तो बस यहीं जम गए..यहां आने के कुछ बरस बाद..मां बाबूजी दोनों ही चल बसे..
  यथा संभव उनकी सेवा करने का प्रयास किया..
अब यहां बच्चों में..स्कूल में मन रम गया है..
  छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर.. आस पास की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण करने चला जाता हूं...
.. ..रोज शाम को स्कूल के बरामदे में बुजुर्गों को पढ़ा देता हूं..अब शायद इस गांव में कोई निरक्षर नहीं है..नशा मुक्ति का अभियान भी चला रक्खा है..अपने हाथों से खाना बना लेता हूं..और किताबें पढ़ता हूं.. बच्चों को अच्छी बुनियादी शिक्षा.. अच्छे संस्कार मिल जाएं..अनुशासन सीखें बस यही ध्येय है.. मै सी ए नहीं कर सका पर मेरे दो विद्यार्थी सी ए हैं..और कुछ अच्छी नौकरी में भी..।
     .. मेरा यहां कोई ज्यादा खर्च है नहीं.. मेरी ज्यादातर तनख़ा इन बच्चों के खेल कूद और स्कूल पर खर्च हो जाती हैं...तुम तो जानते हो कॉलेज के जमाने से क्रिकेट खेलने का जुनून था..! वो बच्चों के साथ खेल कर पूरा हो जाता है..बड़ा सुकून मिलता है.."
      मैंने टोकते हुए कहा...मां बाबूजी के बाद शादी का विचार नहीं आया..?
   उसने मुस्कुराते हुए कहा.." दुनियां में सारी अच्छी चीजें मेरे लिये नहीं बनी है..
   इसलिए जो सामने है..उसी को अच्छा करने या बनाने की कोशिश कर रहा हूं.."
    फिर अपने परिचित दिलचस्प अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला.".अरे वो फ़ैज़ साहेब की एक नज़्म में है न..! .."अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो..अब यहां कोई नहीं..कोई नहीं आएगा.."
      उसकी उस बेलौस हंसी ने भीतर तक भिगो दिया था..
    लौटते हुए मैंने उससे कहा..प्रशांत तुम जब चाहो तुम्हारा ट्रांसफर मुख्यालय या जहां तुम चाहो करा दूंगा..
      उसने मुस्कुराते हुए कहां..अब बहुत देर हो चुकी है.जनाब.. अब यहीं इन लोगों के बीच खुश हूं..कहकर उसने हाथ जोड़ दिए..
      मेरी अपनी उपलब्धियों से उपजा दर्प..उससे आगे निकल जाने का अहसास..भरम.. चूर चूर हो गया था..
    वो अपनी जिंदगी की तमाम कमियों.. तकलीफों..असुविधाओं के बावजूद सहज था. उसकी कर्तव्यनिष्ठा देखकर.. मै हतप्रभ था ..जिंदगी से..किसी शिकवे या.. शिकायत की कोई झलक उसके व्यवहार में...नहीं थी..
    सुखसुविधाओं..उपलब्धियों.. ओहदों के आधार पर हम लोगों का मूल्यांकन करते हैं..लेकिन वो इन सब के बिना मुझे फिर पराजित कर गया था..!
  लौटते समय उस कर्म ऋषि को हाथ जोड़कर..भरे मन से इतना ही कह सका..तुम्हारे इस पुनीत कार्य में कभी मेरी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना मित्र.         
       
             💥जीवन दर्शन💥
 आपका औहदा क्या था या क्या है, यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए🙏🙏

डीएवी सिवान के प्राचार्य श्री  बी आनंद के कलम से

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